brajesh upadhyay

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सोमवार, 10 मार्च 2014

आईसीसी का केंद्रीकरण

एक ओर दुनिया भर में जहां सत्ता के विकेंद्रीकरण की हवा चल रही है. उसके ठीक उलट आईसीसी (अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद) सत्ता के केंद्रीकरण की ओर जा रही है. आईसीसी की कार्यकारिणी में व्यापक पैमाने पर बदलाव प्रस्तावित हैं, जिनके मूर्त रूप लेने पर वैश्‍विक क्रिकेट में प्रमुख निर्णय लेने का अधिकार भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसे धनी क्रिकेट बोर्डों के बीच केंद्रित हो जाएगा. इसके बाद अन्य देशों की विश्‍व क्रिकेट के संचालन में क्या भूमिका होगी, यह ब़डा सवाल है. क्या ये बदलाव क्रिकेट के हित में होंगे? आजकल आईसीसी में बदलाव की बयार चल रही है. आईसीसी के प्रशासनिक और वित्तीय ढांचे में व्यापक पैमाने पर बदलाव का प्रस्ताव रखा गया है. इसे लेकर दुनिया भर के देशों के बीच खींचतान चल रही है. इन बदलावों के मूर्त रूप लेने पर विश्‍व क्रिकेट में फैसले लेने के अधिकांश अधिकार वित्तीय रूप से सुदृढ़ भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के हाथों में आ जाएंगे और क्रिकेट जगत में इन तीन देशों का दखल बढ़ जाएगा. इसके बाद अधिकांश मामलों में इनकी भूमिका निर्णायक होगी. इस प्रस्ताव को लेकर टेस्ट खेलने वाले देश दो धड़ों में बट गए हैं. दोनों धड़ों के बीच बड़े पैमाने पर खींचतान हो रही है. पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) प्रस्तावित बदलावों का खुले तौर पर मुखालफत कर रहा है. दक्षिण अफ्रीका, बांग्लादेश और श्रीलंकाई बोर्ड पाकिस्तान के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं. कुछ बोर्ड अभी भी अनिर्णय की स्थिति में हैं. वहीं न्यूजीलैंड इन बदलावों को सकारात्मक और अपने हित में बता रहा है और इस प्रस्ताव का समर्थन कर रहा है. कोई क्रिकेट को बचाने की गुहार कर रहा है तो कोई व्यक्तिगत फायदे-नुकसान के आधार पर पोजीशन ले रहा है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिरकार आईसीसी में इस तरह के बदलाव करने की किसे और क्यों सूझी और वह इन बदलावों से क्या हासिल करना चाहता है? सबसे पहले आईसीसी में रद्दोबदल का यह प्रस्ताव आईसीसी का कॉमर्शियल राइट्स मीटिंग ग्रुप लेकर आया था. उसे लगा था कि इस तरह के बदलाव करने से आईसीसी की आय में कई गुना इज़ाफा होगा. इस प्रस्ताव को अमलीजामा पहनाने की कवायद आईसीसी ने शुरू कर दी है. फिलहाल बीसीसीआई अपने कद में इज़ाफा होने से खुश है. बीसीसीआई इस प्रस्ताव को अपनी जीत के रूप में देख रहा है. उसके अनुसार यह भारत की पैसे बना सकने की क्षमता को स्वीकृति मिलना (रिकग्नाइजेशन) है. बीसीसीआई आज दुनिया का सबसे धनवान क्रिकेट बोर्ड है. डीआरएस (डिसीजन रिव्यू सिस्टम) जैसे मुद्दों पर भारत के विरोध की वजह से आईसीसी इसे वैश्‍विक स्तर पर लागू नहीं कर सका, जबकि इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया हमेशा इसके समर्थन में रहे हैं. यदि प्रस्ताव के पारित होने के बाद इस तरह की कोई स्थिति निर्मित होती है, तब भारत क्या रुख अख्तियार करेगा. इस प्रस्ताव को पारित करवाकर भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे एशियाई सहयोगियों से दूर हो जाएगा. ये तीनों देश हमेशा बीसीसीआई के साथ खड़े दिखाई दिए. अब भारत सुपर थ्री में शामिल होने के बावजूद कई मुद्दों पर अकेला खड़ा दिखाई देगा, जहां उसके पास बचाव का कोई रास्ता भी नहीं होगा. इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) को क्रिकेट कैलेंडर में विंडो दिए जाने की पैरवी हमेशा से बीसीसीआई करता रहा है, ताकि दुनिया भर के क्रिकेटर उसमें खेल सकें और बीसीसीआई का खजाना भरता रहे, लेकिन निर्णायक भूमिका मिलने के बाद क्या भारत ऐसा कर पाएगा? उसके साथ वे देश निर्णायक भूमिका में होंगे, जो अपने खिलाड़ियों के आईपीएल में खेलने पर पांबदी लगाते रहे हैं. क्या सुपर थ्री में भारत अपने व्यावसायिक हित साध पाएगा? यह बात अभी साफ नहीं हो पा रही है. इस प्रस्ताव के विरोध में सबसे तीखी प्रतिक्रिया पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इमरान खान ने दी है. इमरान ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए बदलावों का विरोध किया है. उनके अनुसार ये बदलाव विवादास्पद हैं. यदि इन बदलावों को स्वीकृति मिल जाती है तो क्रिकेट एक बार फिर से औपनिवेशिक दौर में लौट जाएगा. इमरान का कहना है कि इस प्रस्ताव से उन दिनों की याद ताजा हो गई, जब इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के पास आईसीसी में वीटो पावर होती थी. उस दौर में भारत और पाकिस्तान की स्थिति कमोबेश एक जैसी ही थी. दोनों ही आईसीसी में साम्राज्यवाद को खत्म करने के लिए लड़ रहे थे और इसे लोकतांत्रिक तरीके से चलाने के पक्षधर थे, लेकिन आज भारत पैसे के प्रभाव तथा इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के समर्थन से इसे पुराने रूप में लाना चाहता है. यदि आज मैं पीसीबी का अध्यक्ष होता तो मैं इस औपनिवेशिक प्रणाली का खुलकर विरोध करता. पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष ज़का अशरफ ने आईसीसी मीटिंग के दौरान कहा कि यह देखना है कि हमें पैसा चाहिए या क्रिकेट. यदि क्रिकेट का वजूद बना रहेगा तो सभी बोर्डों को पैसा भी मिलता रहेगा, लेकिन यदि हम केवल पैसे के पीछे भागने लगेंगे तो यह क्रिकेट को वापस नहीं ला पाएगा. हो सकता है कि बांग्लादेश इस प्रस्ताव के समर्थन में खड़ा हो जाए, क्योंकि बांग्लादेश को व्यक्तिगत फायदे दिखाई दे रहे होंगे. उन्हें निकटवर्ती ही नहीं, दूरगामी परिणामों के बारे में भी सोच-विचार करना चाहिए. उन्हें इस बात का भी आकलन करना चाहिए कि इन बदलावों से हमारे देश और हमारे बोर्ड को क्या फायदा होगा. यह बहुत महत्वपूर्ण निर्णय है. इससे पाकिस्तान क्रिकेट का भविष्य भी प्रभावित होगा. इसलिए हम इसे हल्के में नहीं लेंगे और इन प्रस्तावों को लागू होने से रोकने की हरसंभव कोशिश करेंगे. न्यूजीलैंड क्रिकेट बोर्ड के आईसीसी में प्रतिनिधि मार्क स्नीडेन ने बीसीसीआई और प्रस्तावित बदलावों का बचाव करते हुए कहा है कि इन बदलावों से हमें फायदा होगा. ऐसा नहीं है कि वित्तीय फायदों के लिए भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड हमेशा आपस में क्रिकेट खेलते रहेंगे और बाकी टीमें आपस में खेलती रहेंगी. हमें अगले एक दशक में इन तीनों देशों के साथ बहुत क्रिकेट खेलनी है. पिछले कुछ सालों में आईसीसी के लिए सबसे बड़ी दिक्कत रही है कि भारत उनके खेमे में होने के बजाए बाहर रहता था. फिलहाल जो हो रहा है, वह इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया की भारत को अपने खेमे में शामिल करने की कोशिश है, ताकि आईसीसी में समय-समय पर खड़ी होने वाली अनिर्णय की स्थिति से निजात मिल सके. इन बदलावों से हमें आर्थिक फायदा भी मिलेगा. इन संशोधनों के बाद न्यूजीलैंड क्रिकेट का राजस्व 5.20 करोड़ डॉलर से बढ़कर लगभग सात से दस करोड़ डॉलर के बीच का हो जाएगा. श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड ने बदलावों की समीक्षा करने के लिए एक उपसमिति का गठन किया है. बोर्ड के अंदर इस संबंध में अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है. श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड के अधिकांश पदाधिकारी आईसीसी में होने वाले बदलाव के प्रस्ताव के खिलाफ हैं. लगभग सभी सदस्यों का मानना है कि इन बदलावों के लागू हो जाने से विश्व क्रिकेट पर भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड का दबदबा हो जाएगा. श्रीलंका क्रिकेट की कार्यकारी समिति ने इस संबंध में आपात बैठक के बाद कहा कि वह अपने मौजूदा अधिकारों और विशेषाधिकारों का बचाव करेगी. कई लोग इन बदलावों को धनी बोर्डों द्वारा पोषित कट्टरपंथी शासन व्यवस्था की स्थापना बता रहे हैं, क्योंकि बदलावों की वजह से पैसा और पॉवर दोनों ही भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड क्रिकेट बोर्डों के बीच केंद्रित हो जाएगा. दक्षिण अफ्रीकी बोर्ड ने इस प्रस्ताव को मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण बताते हुए इसका कड़ा विरोध कर रहा है और इसे वापस लेने की मांग कर रहा है. फेडेरेशन ऑफ इंटरनेशनल क्रिकेटर्स एसोसिएशन के कार्यकारी अध्यक्ष पॉल मार्श भी प्रस्तावित बदलावों को असंवैधानिक बताते हुए आलोचना कर रहे हैं. आईसीसी के प्रशासन और इसके राजस्व बंटवारे में आमूलचूल बदलाव की मांग का अगर पाकिस्तान, श्रीलंका, बांगलादेश और दक्षिण अफ्रीका विरोध करते हैं तो यह प्रस्ताव विफल हो जाएगा, क्योंकि इस प्रस्ताव को पारित कराने के लिए आईसीसी के 10 पूर्ण सदस्यों में से कम से कम सात सदस्यों का समर्थन मिलना जरूरी है. भारत, आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड को न्यूजीलैंड और जिम्बाब्वे का समर्थन मिलना तय लग रहा है, जबकि वेस्टइंडीज भी इस विवादास्पद प्रस्ताव के पक्ष में मतदान कर सकता है. इस प्रस्ताव को आईसीसी से पारित कराने के लिए दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश में से किसी एक देश को समर्थन में वोट देना होगा. नए बदलाव के बाद भारत को आठ गुना ज्यादा आमदनी आईसीसी से होगी. इससे बीसीसीआई की आमदनी 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच जाएगी. बदलाव से बीसीसीआई को तात्कालिक फायदा होता दिखाई दे रहा है, लेकिन लंबे समय में क्या कुछ होगा, इस बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल है. बीसीसीआई के लिए पैसे और पावर के लिहाज से ज्यादा ताकतवर हो जाएगा. फिलहाल बीसीसीआई केवल अधिकारों की बात कर रहा है. उसके अनुसार इन बदलावों की वजह से वैश्‍विक क्रिकेट गतिविधियों में कोई बदलाव नहीं आएगा. न ही अन्य देशों की भूमिका खत्म हो जाएगी. अन्य देशों को भी एग्जीक्यूटिव कमेटी में शामिल किए जाने के भी कई तरह के प्रस्तावों पर चर्चा हो रही है, जिससे कि निर्णय लेने में अन्य देशों की भूमिका बनी रह सके. आईसीसी में इस तरह के बड़े बदलाव से क्रिकेट को फायदा होगा या नुकसान या फिर क्रिकेट एक वैश्‍विक खेल में परिवर्तित हो पाएगा, इन सलावों का कोई स्पष्ट जवाब कहीं भी दिखाई नहीं पड़ रहा है. यहां सबसे बड़ी चुनौती टेस्ट क्रिकेट के वजूद को बचाए रखने और टी-20 के माध्यम से क्रिकेट को वैश्‍विक खेल में परिवर्तित करने की है. इन दोनों चुनौतियों का एक साथ सामना करना और उनके बीच तालमेल बना पाना मुश्किल जरूर है, लेकिन नामुमकिन नहीं. बदलाव का लक्ष्य केवल धन उगाही नहीं होना चाहिए. खेल की गुणवत्ता को बनाए रखना सबसे ज्यादा जरूरी है. क्रिकेट को केवल रन और पैसे के खेल या कहें कि बेसबॉल जैसे खेल में बदलने से रोकना होगा. क्रिकेट में रोमांच ऑन फील्ड गतिविधियों की वजह से आना चाहिए, न कि ऑफ फील्ड एक्टीविटी से. फिलहाल जो बदलाव हो रहे हैं, उनसे ऑफ फील्ड गतिविधियां क्रिकेट पर हावी होती दिख रही हैं. यदि आगे ऐसा होगा तो क्रिकेट का भविष्य सुरक्षित नहीं रह जाएगा.

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