brajesh upadhyay
सोमवार, 10 मार्च 2014
फीफा क्यों है भारत पर मेहरबान
भारत में आईपीएल की शुरुआत ने खेल जगत की तस्वीर बदल कर रख दी. आईपीएल ने भारत को दुनिया के एक बड़े खेल बाज़ार के रूप में स्थापित कर दिया. फीफा जैसी खेल संस्था किसी भी तरह भारत में फुटबॉल को स्थापित करके दुनिया के सबसे बड़े और उभरते खेल बाज़ार का दोहन करना चाहती है.
दुनियाभर में भारत की छवि एक ऐसे देश के रूप में स्थापित हो रही है जहां खेलों को विशेष महत्व दिया जाने लगा है. क्रिकेट के अलावा दूसरे खेल भी धीर-धीरे भारत में लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं. लेकिन दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल फुटबॉल की स्थिति यहां जस की तस बनी हुई है. पारंपरिक रूप से भारत में जिन जगहों फुटबॉल खेली जाती रही है उन जगहों को छोड़ दें तो फुटबॉल गलियों और नुक्कड़ों में खेले जाने वाले खेल में तब्दील नहीं हो सका है. यहां उसका सीधा मुक़ाबला क्रिकेट से है. भारत में फुटबॉल को लोकप्रिय बनाने की दिशा में फुटबॉल की सर्वोच्च संस्था फीफा काम करती दिख रही है. उसकी पहल पर भारत को 2017 में होने वाले अंडर-17 विश्वकप की मेजबानी मिल गई है. फीफा भारत के वर्ष 2022 में दोहा में होने वाले सीनियर फुटबॉल विश्वकप के लिए क्वालीफाई करने की संभावनाओं को साकार करने की दिशा में भी काम करता दिख रहा है. इसके इतर एआईएफएफ देश में फुटबॉल के स्तर को ऊपर उठाने के लिए आईपीएल की तर्ज पर खेली जाने वाली फुटबॉल लीग के आयोजन के लिए पुरजोर कोशिश करता दिख रहा है जिसमें रिलांयस जैसे भारत के बड़े कॉर्पोरेट घराने रुचि दिखा रहे हैं. इसके साथ ही भारतीय खिला़िडयों को यूरोपीय लीग में खेलने का मौका मिल रहा है. कोका कोला जैसी कंपनियां भी भारत में फुटबॉल के विकास के लिए उतावली दिख रही हैं. इसके पीछे कोई सकारात्मक सोच नहीं है बल्कि कार्पोरेट घरानों का फायदे का गणित दिखाई दे रहा है. आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार है. यूरोप में खेली जाने वाली फुटबॉल स्पर्धाएं भारतीयों को समसामयिक फुटबॉल से जोड़ने में कामयाब तो हुईं लेकिन वे उन्हें फुटबॉल के मैदान तक नहीं ला सकीं. इस वजह से वह फीफा अब दूसरे प्लान पर काम करने लगा है. फुटबॉल को भारत में क्रिकेट जैसा लोकप्रिय बनाने के लिए वह अंडर 17 विश्वकप जैसी प्रतियोगिताओं का सहारा लेता दिख रहा है और इसी राह पर चलकर वह भारत को फीफा विश्वकप के मेन ड्रा में भी पहुंचाना चाहता है.
फीफा की भारत में फुटबॉल के विकास की योजना कोई सामाजिक सरोकार को लेकर नहीं बनाई गई है बल्कि यह एक दीर्घकालिक निवेश है. भारत में फुटबॉल के विकास के मद्देनजर फीफा ने 2011 में अपना दक्षिण एशिया का क्षेत्रीय कार्यालय, जो श्रीलंका में वर्षों से कार्यरत था, नई दिल्ली स्थानांतरित कर दिया है. यह इस बात का सूचक है कि फीफा भारत में चल रही योजनाओं पर सीधे तौर पर नजर रखना चाहता है जिससे कि कम से कम समय में भारत में फुटबॉल को ज्यादा से ज्यादा लोकप्रिय बनाया जा सके. एशिया में फीफा की वरीयता सूची में भारत पहले नंबर पर है. फीफा भारत में यूथ ओरिएन्टेड फुटबॉल डेवलपमेंट प्रोग्राम चला रहा है. द विन इन इंडिया विथ इंडिया नाम से चलाए जा रहे कार्यक्रम के अंतर्गत फीफा ने भारत के सात विभिन्न जोनों में तकनीकी(टेक्निकल) सेंटरों और आठ कृत्रिम टर्फ के निर्माण के लिए 80 लाख अमेरिकी डॉलर खर्च किए हैं. इसके अलावा फीफा ने वर्ष 2012 में प्रोजेक्ट गोल के अंतर्गत दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरू में चार क्षेत्रीय अकादमी के निर्माण के लिए अतिरिक्त फंड उपलब्ध कराया. इन आधारभूत कार्यक्रमों के अलावा फीफा कोचों को प्रशिक्षित करने के लिए भी एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है. क्षेत्रीय अकादमियों में जनवरी 1999 के बाद जन्म लेने वाले खिलाड़ियों को जगह दी गई है जिससे की वे भविष्य में भारतीय फुटबॉल को शिखर पर ले जाने में अपना योगदान दे सकें. एक मुख्य अकादमी के अलावा पांच अतिरिक्त अकादमियों के 2013 में खोले जाने की योजना थी इन अकादमियों का मुख्य लक्ष्य एएफसी कप और फीफा विश्व कप जैसी प्रतियोगिताओं के लिए सभी आयु वर्ग के खिलाड़ियों को तैयार करना है. इंफ्रास्ट्रकचर उपलब्ध कराने के अलावा भारतीय युवा खिलाड़ियों को ज्यादा से ज्यादा मैच खेलने का अनुभव देना भी जरूरी है वह भी तब जब भारत की अंडर-16 राष्ट्रीय टीम 2007 और 2011 में एएफसी टूर्नामेंट में क्वालीफाई करने में सफल रही है. इसके लिए भी फीफा काम कर रहा है. इसी कड़ी में भारत को 2017 में होने वाले अंडर -17 विश्वकप का मेजबान बनाया गया है. इसके अलावा भारत 2015 और 2016 में सीनियर स्तर पर होने वाली क्लब चैंपियनशिप की मेजबानी के लिए भी अपनी दावेदारी पेश करने जा रहा है. इस बात की पूरी संभावना है कि फीफा भविष्य के फायदों को ध्यान में रखते हुए मेजबानी करने का मौका भारत को दे.
भारत को युवाओं का देश कहा जाता है. दुनिया की 13 प्रतिशत आबादी फुटबॉल के ग्लैमर से अब तक अछूती है. भारत जैसे देश में क्रिकेट को धर्म का दर्जा प्राप्त है जो स्थिति ब्राजील में फुटबॉल की है कुछ ऐसा हाल ही भारत में क्रिकेट का है. जिस तरह ब्राजील में हर कोई फुटबॉल खिलाड़ी बनने का सपना संजोता है उसी तरह भारत में हर कोई क्रिकेट खिलाड़ी बनने का सपना देखता है. ऐसे में भारत में फुटबॉल की जड़ें जमाना आसान नहीं होगा. युवाओं के जिस पूल से फुटबॉल खिलाड़ी निकालने हैं वो क्रिकेट के दीवाने हैं. जब तक युवाओं को उनका करियर पेशेवर फुटबॉल खिलाड़ी के रूप में फलता-फूलता नहीं दिखाई देगा तब तक वे फुटबॉल को गंभीरता से नहीं लेंगे और उसकी तरफ रुख नहीं करेंगे. चीन दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश है जहां फुटबॉल लोकप्रिय हो चुका है. इस सूची में भारत का नाम ही मिसिंग है. भारत जैसे दुनिया की सबसे अधिक युवा आबादी वाले देश में फुटबॉल को लोकप्रिय बनाने की अपार संभावनाएं हैं. फीफा के लिए यह एक बड़ी चुनौती भी है. क्योंकि भारत में फुटबॉल को लोकप्रिय बनाए बिना वह रेवेन्यू में इज़ाफा नहीं कर सकता है. यूरोप और अमेरिकी देशों के खेल बाजार में सेचुरेशन की स्थिति आ गई है. दुनिया का हर एक खेल संगठन भारत की ओर रुख कर रहा है. ये उनकी मजबूरी है. दुनिया के कई देश एक साथ मिलकर भी भारत जितना बड़ा खेल बाज़ार उपलब्ध नहीं करा सकते हैं. इसलिए वे भारत को हर मामले में सर्वोच्च वरीयता देने लगे हैं. इसी वजह से भारत को अंडर-17 विश्वकप की मेजबानी दिए जाने की पहल फीफा के आलाधिकारियों ने ही की थी.
खैर, भारत को 2017 में होने वाले अंडर-17 फीफा विश्वकप की मेजबानी मिल गई है. जब सारी दुनियां की नज़रें 2014 में ब्राजील में होने वाले विश्वकप के संभावित विजेता के ऊपर टिकी हुई है. तब भारत के 2022 में कतर में होने वाले फीफा विश्वकप में क्वालीफाई करने पर अटकलें लगने लगी हैं. भारत ने मेजबानी की दौड़ में शामिल अन्य देशों दक्षिण अफ्रीका, आयरलैंड और उज्बेकिस्तान को पीछे छोड़ा और प्रत्येक दो वर्ष में होने वाले 24 देशों के इस टूर्नामेंट के आयोजन का अधिकार पाया. मेजबान देश होने के कारण भारत अपने इतिहास में पहली बार इस टूर्नामेंट में भाग लेगा. यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या भारत इस मौके को विश्व फुटबॉल पटल पर स्थापित करने के लिए उपयोग कर पाएगा? क्या फीफा का पहला दांव सफल होगा? अंडर-17 विश्व कप के आयोजन में अभी तीन साल हैं. इन तीन सालों में भारत को जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना है, साथ ही खिलाड़ियों का एक ऐसा पूल बनाना है जो पेशेवर भी हों और प्रतिभाशाली भी जो कि ब्राजील, जर्मनी और स्पेन जैसी टीमों के साथ दो-दो हाथ करने का माद्दा रखते हों और भारत को फुटबॉल के शिखर पर भी पहुंचा सकें. जिससे न केवल देश के लोगों के दिलो-दिमाग पर छाए रहने वाले क्रिकेट का मायाजाल भंग हो और भारतीय युवा विश्व के सबसे लोकप्रिय खेल की ओर रुख करें.
देश में फुटबॉल का कायाकल्प करने की प्राथमिक जिम्मेदारी अखिल भारतीय फुटबॉल संघ (एआईएफएफ) की है जिसके कंधों पर भारतीय फुटबॉल के विकास का पूरा भार है. भारत सरकार उसका केवल बाहर से सहयोग कर सकती है. लंबे इंतजार के बाद हाथ में आए इस मौके को किस रणनीति के तहत एआईएफएफ किस तरह उपयोग करता है यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन वह तीन साल के थोड़े से वक्त में किस तरह इस आयोजन को सफल बना पाएगा, यह देखना दिलचस्प होगा. भारत को इस बड़े टूर्नामेंट की मेजबानी छह से आठ शहरों में करनी होगी. नई दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, गुवाहाटी, मडगांव, कोच्चि और बेंगलुरु आदि शहर मेजबान हो सकते हैं. क्योंकि इन शहरों में पहले से ही फुटबॉल के मैदान हैं. उपलब्ध खेल मैदानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं उपलब्ध कराना, नई सुविधाएं डेवलप करने से बेहतर विकल्प है. लेकिन मैंगलोर में फुटबॉल मैच से ठीक पहले दर्शक दीर्घा का ढह जाना भी पहले से स्थापित इंन्फ्रास्ट्रक्चर की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करता है. नई सुविधाएं विकसित करने की बात सामने आते ही राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान हुए घोटालों की तस्वीर सामने आ जाती है, जहां समय रहते कोई भी काम पूरा नहीं हो सका था. अंडर-17 विश्वकप की तैयारी के लिए जो वक्त है वह राष्ट्रमंडल खेलों की तुलना में बेहद कम है.
फीफा को भारत में फुटबाल के विकास की अपार संभावनाएं नज़र आती हैं. फीफा का मानना है कि यदि भारत इस टूर्नामेंट का आयोजन करेगा, तो स्वाभाविक रूप से इस खेल को देश में लोकप्रिय बनाने में मदद मिलेगी. भारत के लिए मेजबानी हासिल करने की राह आसान नहीं रही. जनवरी में भारत की शुरुआती बोली नामंजूर कर दी गई, क्योंकि फीफा सरकार से कई विषयों पर स्पष्ट गारंटी चाहता था. सरकार से गारंटी मिलने के बाद एक प्रकार से पूर्वनियोजित तरीके से भारत को मेजबान घोषित कर दिया गया.
फीफा के अलावा अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल क्लबों ने भी भारतीय बाजार पर कब्जा करने का फैसला किया है. मैनेचेस्टर यूनाइटेड और आर्सेनल जैसे क्लबों ने भारत में फुटबॉल स्कूल खोले हैं. मैनेचेस्टर युनाइटेड ने वर्ष 2011 में मुंबई में और आर्सेनल ने दिल्ली में फुटबॉल प्रशिक्षण स्कूल खोले हैं. कुछ यूरोपीय क्लबों ने पहले से कार्य कर रहे फुटबॉल स्कूलों के साथ समझौते किए हैं. स्पेनिश क्लब रियल मैड्रिड ने कोलकाता में फुटबॉल अकादमी खोलने का निर्णय लिया है. पिछले साल अक्टूबर में लीवरपूल ने महाराष्ट्र के पुणे में फुटबॉल स्कूल की शुरुआत की है, जो कि सर्वसुविधायुक्त है. यह स्कूल 18 से 19 वर्ष तक के भारतीय खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करेगा. बायर्न म्युनिख और चेल्सी जैसे क्लबों में भी भारत में निवेश करने संबंधी बातें हो रही हैं.
भारतीय खिलाड़ी भी विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं. हाल ही में भारतीय टीम के गोलकीपर सुब्रतो पॉल किसी यूरोपीय प्रथम श्रेणी टीम की ओर से खेलने वाले पहले भारतीय बने हैं. उन्हें डेनमार्क के वेस्ट्स्जालैंड क्लब की ओर से खेलने का मौका मिला है. इस क्लब को एफसी वाइकिंग्स के नाम से भी जाना जाता है. पिछले साल भारतीय कप्तान सुनील क्षेत्री को भी पुर्तगाल के स्पोर्टिंग क्लब लिस्बन की ओर से बी लीग में खेलने का मौका मिला था. यह एक तरह से अंतरराष्ट्रीय भारतीय फुटबॉल स्टार बनाने की कवायद है जिसे धीरे-धीरे अंजाम तक पहुंचाया जा रहा है. एक साथ बहुत से क्लबों में भारतीयों की उपस्थिति कई सवाल खड़े कर सकती है. इसलिए इस योजना पर धीरे-धीरे काम हो रहा है.
कुछ सालों से दुनियाभर के अधिकांश खेल आयोजन ब्रिक्स देशों(ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) में हो रहे हैं. जैसे कि 2008 के ओलंपिक चीन के बीजिंग में, 2010 में राष्ट्रमंडल खेल भारत के नई दिल्ली में, 2010 के एशियाई खेल चीन के ग्वांगजू में, 2010 में फीफा विश्वकप दक्षिण अफ्रीका में, 2014 में शीतकालीन ओलंपिक सोची (रूस) में, 2014 का फीफा विश्वकप ब्राजील में, 2018 का फीफा विश्वकप रूस में, 2016 के ओलंपिक रियो डि जेनेरियो ब्राजील में आयाजित हो रहे हैं. दुनिया में खेलों का पहिया इन्हीं पांच देशों के इर्द गिर्द होकर गुजर रहा है. इसलिए बड़े खेल आयोजनों के लिए भारत को तैयार करना पश्चिमी देशों की मजबूरी है. क्योंकि 2004 में एथेंस ओलंपिक के आयोजन के बाद ग्रीस की अर्थव्यवस्था के ल़डख़डा जाने के बाद यूरोपीय देश इस तरह के आयोजनों से बचते दिख रहे हैं. कम समय अंतराल पर एक देश को दोबारा इन खेलों का मेजबान भी नहीं बनाया जा सकता है. इसलिए भारत को जल्दी ही बलि का बकरा बनाने के लिए नीतिगत तौर पर तैयारी हो रही है. राष्ट्रगौरव के नाम पर खेलों का आयोजन करना देश के लोगों के लिए कैसा होता है, इसे ब्राजील में साफ तौर पर देखा जा सकता है. ब्राजील में फुटबॉल विश्वकप और ओलंपिक खेलों के आयोजन को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि सुदृढ़ अर्थव्यवस्था भारत जैसे देश को प्रतियोगिता का मेजबान बना सकने में सहायक हो सकती है, लेकिन खेल का स्तर सुधारने के लिए व्यापक बदलाव करने होंगे. फीफा किसी तरह इस बात को सुनिश्चित करने में लगा है कि भारत फुटबॉल के मैदान में एक बार फिर से अपने चरम पर या उससे बेहतर स्थिति में पहुंचे. दोनों परिस्थितियों में दोनों पक्षों की जीत होगी. फीफा भारतीय फुटबॉल के उत्थान के नाम पर भारतीय बाज़ार का दोहन करने की तैयारी में जुटा है और भारत फुटबॉल की दुनिया में अपने सितारों को चमकते देखना चाहता है. यही दोनों को भारतीय फुटबॉल के कायाकल्प के लिए प्रेरित कर रहा है. यहां सबके अपने स्वार्थ हैं.
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