brajesh upadhyay

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सोमवार, 10 मार्च 2014

सर्वश्रेष्ठ भारतीय एथलीट

भारत ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धाओं में हमेशा से पदकों के लिए तरसता रहा है. भारत के सर्वकालिक महान एथलीटों में शुमार फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह और उडन परी पी टी ऊषा जो नहीं कर पाए, वह कारनामा अंजू बॉबी जॉर्ज ने कर दिखाया है. क्या अंजू भारत की सर्वश्रेष्ठ एथलीट हैं? बड़ी ख़ामोशी और प्रशंसकों की ग़ैर-मौजूदगी में वर्ष 2005 में मोनेको में वर्ल्ड एथलेटिक्स फाइनल मुक़ाबले में अंजू बॉबी जॉर्ज को मिला रजत पदक अब स्वर्ण में बदल गया है. इस तरह अंजू किसी विश्‍व स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय एथलीट बन गईं हैं. फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह और उड़न परी पी टी ऊषा जो नहीं कर पाए, दरअसल वह कारनामा अंजू बॉबी जॉर्ज ने कर दिखाया है. वर्ष 2005 में मोनेको में महिलाओं की लंबी कूद स्पर्धा में रूसी खिलाड़ी तत्याना कुतोवा ने 6.83 मीटर लंबी छलांग लगाकर स्वर्ण पदक पर क़ब्ज़ा किया था. वहीं अंजू 6.75 मीटर लंबी छलांग लगाकर दूसरे स्थान पर रहीं और उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा था. हालांकि, वह दौर अंजू के करियर का सर्वश्रेष्ठ दौर था. अंजू अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन कर रहीं थीं. वर्ष 2003 में अंजू पेरिस में आयोजित विश्‍व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनी थी. उसके बाद वर्ष 2004 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सबसे बड़े खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न से सम्मानित किया था. अंजू उस दौर की एक अविवादित एथलीट थीं, जिनके करियर पर किसी भी तरह का दाग़ नहीं लगा था. कहते हैं भगवान के घर में देर है, लेकिन अंधेर नहीं. जिस खेल भावना के साथ अंजू खेलीं, अंततः उसका सकारात्मक परिणाम निकला और आठ साल बाद अंजू का विश्‍व चैंपियन बनने का सपना पूरा हुआ. वैसे उनकी इस उपलब्धि के बाद यह बहस भी छिड़ गई कि भारत का सर्वकालिक एथलीट कौन है? आइएएएफ के फैसले से कोटोवा के अयोग्य घोषित होने के बाद के बाद नई रैंकिंग इस प्रकार हैं. स्वर्ण पदक – अंजू बॉबी जॉर्ज (भारत , 6.75 मीटर) रजत पदक – अनुग्रह उपसा (अमरीका, 6.67 मीटर) कांस्य पदक – ईयूनिस नाई (फ्रांस , 6.51मीटर) यदि आपको किसी लोकप्रिय भारतीय एथलीट का नाम लेने को कहा जाए, तो सबसे पहले आपके जेहन में मिल्खा सिंह और पीटी ऊषा का नाम आता है. दोनों ने ही ब़हुत मुश्किलों का सामना करते हुए दुनिया भर में भारत का परचम लहराया था. दोनों ही खिलाड़ी ओलंपिक पदक जीतने से महज कुछ दूरी पर रह गए. उड़न सिख के नाम से विख्यात मिल्खा सिंह वर्ष 1960 के रोम ओलंपिक में चौथे स्थान पर रहे थे. तब उनका नाम पदक जीत सकने वालों की सूची में सबसे ऊपर था. हर किसी को आशा थी कि मिल्खा सिंह भारत के लिए पदक जीतेंगे, लेकिन वह चूक गए. वैसे मिल्खा सिंह ने अपने करियर में तीन ओलंपिक खेलों में भाग लिया, लेकिन वह कोई पदक नहीं जीत सके. हालांकि, राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों में उनका दबदबा बना रहा. उन्होंने वर्ष 1958 में टोकियो में 200 मीटर और 400 मीटर स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीता था. मिल्खा सिंह ने एशियाई खेलों में कुल चार स्वर्ण पदक जीते थे. कहा जाता है कि मिल्खा सिंह ने अपने जीवन में कुल 80 प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया और 77 मुक़ाबले में उन्हें जीत मिली थी. भारत में उड़न परी के नाम से मशहूर पीटी ऊषा ने भारत के लिए कई ख़िताब जीते, जिस पर देश को हमेशा गर्व रहेगा. पीटी ऊषा पहली बार वर्ष 1980 में मॉस्को ओलंपिक में हिस्सा लिया था. मॉस्को ओलंपिक में वह पदक जीतने में भले ही सफल नहीं हुईं, लेकिन वह अपनी छाप छोड़ने में कामयाब ज़रूर हुई थीं. वर्ष 1982 के दिल्ली एशियाई खेलों में उन्होंने 100 मीटर और 200 मीटर की स्पर्धाओं में रजत पदक जीतकर यह साबित कर दिया कि वह आने वाले समय में वह एक बड़ी खिलाड़ी बनेंगी. उसके बाद कतर में वर्ष 1983 में ट्रैक एंड फील्ड प्रतियोगिता में उन्होंने 400 मीटर स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीता. 1984 में लॉस एंजिल्स में संपन्न हुए ओलंपिक खेलों में उन्होंने 400 मीटर बाधा दौड़ के सेमीफाइनल में पहला स्थान प्राप्त किया था. इसी के साथ वह ओलंपिक के फाइनल मुक़ाबले में पहुंचने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनीं. हालांकि, फाइनल मुक़ाबले में वह कांस्य पदक जीतने से चूक गईं. इसके बाद भी ऊषा ने हार नहीं मानी और उन्होंने अपनी मेहनत जारी रखी. वर्ष 1986 में सियोल एशियाई खेलों में पीटी ऊषा ने 4 स्वर्ण और 1 रजत पदक जीता था. उन्हें एशियाई खेलों का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी घोषित किया गया था. उन्होंने वर्ष 1984 से लेकर 1989 तक एशियाई ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धाओं में 13 स्वर्ण पदक जीते थे. वह 1984 से 1989 तक पांच बार सर्वश्रेष्ठ एशियाई खिलाड़ी और 1984 एवं 1985 में विश्‍व की सर्वश्रेष्ठ एथलीट चुनी गईं थीं. हालांकि पीटी ऊषा ओलंपिक में कोई पदक नहीं जीत सकीं, लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिभा से लोगों का दिल जीत लिया. वहीं अंजू बॉबी जॉर्ज अपने करियर की शृरूआत में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परचम लहराना शुरू कर दिया था. अंजू ने वर्ष 2002 में मैनचेस्टर राष्ट्रमंडल खेलों में लंबी कूद का कांस्य पदक जीता था. इसके बाद वर्ष 2002 में हुए बुसान एशियाई खेलों में लंबी कूद का स्वर्ण पदक पर भी क़ब्ज़ा किया. बुसान के फॉर्म को अंजू ने आगे भी बरकरार रखते हुए वर्ष 2003 में पेरिस वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीत कर इतिहास रच दिया. ऐसा करने वाली वह पहली भारतीय एथलीट बनीं. वर्ष 2005 में मोनेको में हुए वर्ल्ड एथलेटिकस फाइनल में उन्होंने अपना परचम लहराया और रजत पदक जीतने में कामयाब हुईं. इसी के साथ दुनिया भर में अंजू मशहूर खिलाड़ी बन गई. वर्ष 2004 के एथेंस ओलंपिक में उन्हें छठा स्थान प्राप्त हुआ. वैसे वह विश्‍व चैंपियनशिप में किए अपने कारनामे को दोहराने में असफल रहीं. उसके बाद कोरिया के इचोहेन में हुई एशियन चैंपियनशिप में भी उन्होंने स्वर्ण पदक जीता, लेकिन 2006 में दोहा एशियाई खेलों में उन्हें रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा. अंजू इसके बाद किसी भी विश्‍व चैंपियनशिप में पदक नहीं जीत पाईं. अंजू बॉबी जॉर्ज की उपलब्धियां अंजू बॉबी जॉर्ज वर्ष 2003 में पेरिस में आयोजित विश्‍व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनी थी. उन्हें वर्ष 2003 में अर्जुन पुरस्कार और वर्ष 2004 में राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार प्रदान किया गया था. वर्ष 2004 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया. ग़ौरतलब है कि वर्ष 2007 के आईएएएफ रैंकिग में उन्हें चौथा स्थान मिला. विश्‍व रैंकिंग के टॉप फाइव में जगह पाने वाली वह पहली भारतीय एथलीट थीं. अंजू वर्ष 2001 से 2003 के अंतराल में विश्‍व रैंकिंग में 61 पायदान से 6 वें पायदान पर पहुंची थीं. अंजू ने अपने पूरे करियर के दौरान कड़ी मेहनत की और उस मुकाम पर पहुंची, जहां हर कोई पहुंचना चाहता है. देर से ही सही पर उन्हें विश्‍व चैंपियन का ख़िताब हासिल हुआ. उल्लेखनीय है कि वर्ष 2004 के ओलंपिक से लेकर अब तक के सैंपल की एक बार फिर से जांच करने का फैसला आईएएएफ ने किया है. हो सकता है कि भविष्य में अंजू बॉबी जार्ज ओलंपिक पदक विजेता भी बन जाए. अगर वह ओलंपिक पदक जीतने में कामयाब नहीं होती हैं, तब भी उनका नाम भारत के सर्वकालिक महान एथलीटों में शामिल रहेगा. डोपिंग के जाल से बचकर अंजू बॉबी जार्ज ने बिना विचलित हुए जो कारनामा कर दिखाया है, वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है. मिल्खा सिंह और पीटी ऊषा आज भी देश के उभरते हुए प्रतिभावान खिलाड़ियों के लिए एक आदर्श हैं. देश भर में लोग उन्हें जानते हैं और उनके जैसा बनना चाहते हैं. तीनों की उपब्धियों पर देश को गर्व है. हालांकि, अंजू इन दोनों महान खिलाड़ियों से एक कदम आगे बढ़ गई हैं, क्योंकि वह विश्‍व चैंपियन हैं. उन्होंने देश वासियों के लिए जो उपलब्धि हासिल की है, दरअसल वह अनमोल है. वैसे कोई भी खिलाड़ी एक-दूसरे से कमतर नहीं हैं. उन्होंने अपने-अपने समय में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. किसी विवाद में फंसे बग़ैर अंजू ने देश का मान बढ़ाया.

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