brajesh upadhyay

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गुरुवार, 13 मार्च 2014

शारजाह और बांग्लादेश में होंगे आईपीएल मैच

मैच फिक्सिंग को लेकर मचे बबाल के बीच पैसे और ग्लैमर के क्रिकेट टूर्नामेंट आईपीएल के कार्यक्रम की घोषणा कर दी गई है। टूर्नामेंट के मुकाबले संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बांग्लादेश और मेजबान इंडिया में खेले जाएंगे। मैच वेन्यू में यूएई में दुबई, शारजाह और अबु धाबी स्टेडियम का नाम शामिल है। अब सवाल यह उठता है कि बीसीसीआई (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड) द्वारा इंटरनेशनल मैचों के लिए शारजाह को बायकॉट करने के बाद आईपीएल के लिए क्यों चुना गया? जबकि, फिक्सिंग को लेकर ये मैदान पहले ही काफी कुख्यात हैं। शारजाह यानी फिक्सिंग का स्वर्ग? शारजाह का मैदान जहां अपनी खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध रहा है, वहीं इस जगह से सट्टेबाजी के तार भी कई बार जुड़े हैं।
अंपायर को की गई थी 10,000 पाउंड की पेशकश पूर्व इंटरनेशनल अंपायर जॉन होल्डर ने पिछले वर्ष 27 मई को एक खुलासा किया था। उन्होंने यह कहते हुए सनसनी फैला दी थी कि पाकिस्तान और श्रीलंका के बीच 1993 में शारजाह में खेले गए वनडे मुकाबले में फिक्सिंग के प्रयास किए गए थे। उस मैच के लिए उन्हें एक बुकी ने 10,000 पाउंड देने की पेशकश की थी।
दुबई से जुड़े फिक्सिंग के तार शारजाह ही वह मैदान है जहां अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहम ने एक मुकाबले के दौरान क्रिकेट मैच फिक्स करने का ऑफर दिया था। इस बात के खुलासा होते ही भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने शारजाह, यूएई और सिंगापुर में खेलने से किनारा कर लिया था।
मजहर मजीद खेलता था दुबई से खेल 2010 में इंग्लैंड के खिलाफ लंदन में खेला गया मैच पाकिस्तान के लिए तूफान लेकर आया था। नो बॉल के चक्कर में पाकिस्तान के तत्कालीन कप्तान सलमान बट्ट, गेंदबाज मोहम्मद आमिर और मोहम्मद आसिफ ऐसे उलझे कि उनका अच्छा खासा क्रिकेट करियर चौपट हो गया। इन खिलाड़ियों ने बाद में खुलासा किया कि फिक्सिंग के तार पाकिस्तान के मजहर मजीद से जुड़ा था। वह दुबई में रहकर पूरा खेल खेलता था।
आईपीएल-6 में तीन खिलाड़ी हुए बैन कनेक्शन दुबई का शिकार भारत भी हुआ। पिछले वर्ष आईपीएल-6 के दौरान राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों पर फिक्सिंग का अरोप लगा। इसमें श्रीसंथ, अंकित और अजित चांदिला के नाम शामिल रहे। चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक और बीसीसीआई के अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन के दामाद मयप्पन, दारा सिंह के बेटे विंदू का नाम पूरे जोर-शोर से उठा। इन सभी को जेल भी जाना पड़ा। इस मामले का कनेक्शन भी दुबई से जुड़ा बताया गया था। हालांकि किसी नाम का खुलासा नहीं हुआ।
पिछले 14 सालों में सिर्फ दो मैच रिकॉर्ड देखा जाए तो 2000 से पहले प्रतिवर्ष शारजाह में 10-15 मैच खेलने वाली टीम इंडिया ने पिछले 14 साल में केवल दो मुकाबले खेले हैं। अचानक ऐसा क्या हुआ कि आईपीएल के 16 मुकाबले वहां करवाने का फैसला कर लिया, जबकि उसके पास साउथ अफ्रीका को चुनने का ऑफर था।
क्यों नहीं चुना साउथ अफ्रीका को? आईपीएल के पहले संस्करण से ही फिक्सिंग की बात होती रही है। कई मामले भी सामने आए। इसके कारण भारत को अपने कई उभरते खिलाड़ियों को खोना पड़ा। आईपीएल का दूसरा संस्करण दक्षिण अफ्रीका में खेला गया था। इस बार भी वहां खेल आयोजित करवाया जा सकता था। इसके पीछे प्रमुख कारण बीसीसीआई और साउथ अफ्रीका के अध्यक्ष हारुन लोर्गट के बीच अच्छा संबंध नहीं होना है। इसी कारण भारत ने अपने पिछले टूर के दौरान मैचों में कटौती भी की थी।

सोमवार, 10 मार्च 2014

फीफा क्यों है भारत पर मेहरबान

भारत में आईपीएल की शुरुआत ने खेल जगत की तस्वीर बदल कर रख दी. आईपीएल ने भारत को दुनिया के एक बड़े खेल बाज़ार के रूप में स्थापित कर दिया. फीफा जैसी खेल संस्था किसी भी तरह भारत में फुटबॉल को स्थापित करके दुनिया के सबसे बड़े और उभरते खेल बाज़ार का दोहन करना चाहती है. दुनियाभर में भारत की छवि एक ऐसे देश के रूप में स्थापित हो रही है जहां खेलों को विशेष महत्व दिया जाने लगा है. क्रिकेट के अलावा दूसरे खेल भी धीर-धीरे भारत में लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं. लेकिन दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल फुटबॉल की स्थिति यहां जस की तस बनी हुई है. पारंपरिक रूप से भारत में जिन जगहों फुटबॉल खेली जाती रही है उन जगहों को छोड़ दें तो फुटबॉल गलियों और नुक्कड़ों में खेले जाने वाले खेल में तब्दील नहीं हो सका है. यहां उसका सीधा मुक़ाबला क्रिकेट से है. भारत में फुटबॉल को लोकप्रिय बनाने की दिशा में फुटबॉल की सर्वोच्च संस्था फीफा काम करती दिख रही है. उसकी पहल पर भारत को 2017 में होने वाले अंडर-17 विश्‍वकप की मेजबानी मिल गई है. फीफा भारत के वर्ष 2022 में दोहा में होने वाले सीनियर फुटबॉल विश्वकप के लिए क्वालीफाई करने की संभावनाओं को साकार करने की दिशा में भी काम करता दिख रहा है. इसके इतर एआईएफएफ देश में फुटबॉल के स्तर को ऊपर उठाने के लिए आईपीएल की तर्ज पर खेली जाने वाली फुटबॉल लीग के आयोजन के लिए पुरजोर कोशिश करता दिख रहा है जिसमें रिलांयस जैसे भारत के बड़े कॉर्पोरेट घराने रुचि दिखा रहे हैं. इसके साथ ही भारतीय खिला़िडयों को यूरोपीय लीग में खेलने का मौका मिल रहा है. कोका कोला जैसी कंपनियां भी भारत में फुटबॉल के विकास के लिए उतावली दिख रही हैं. इसके पीछे कोई सकारात्मक सोच नहीं है बल्कि कार्पोरेट घरानों का फायदे का गणित दिखाई दे रहा है. आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार है. यूरोप में खेली जाने वाली फुटबॉल स्पर्धाएं भारतीयों को समसामयिक फुटबॉल से जोड़ने में कामयाब तो हुईं लेकिन वे उन्हें फुटबॉल के मैदान तक नहीं ला सकीं. इस वजह से वह फीफा अब दूसरे प्लान पर काम करने लगा है. फुटबॉल को भारत में क्रिकेट जैसा लोकप्रिय बनाने के लिए वह अंडर 17 विश्‍वकप जैसी प्रतियोगिताओं का सहारा लेता दिख रहा है और इसी राह पर चलकर वह भारत को फीफा विश्‍वकप के मेन ड्रा में भी पहुंचाना चाहता है. फीफा की भारत में फुटबॉल के विकास की योजना कोई सामाजिक सरोकार को लेकर नहीं बनाई गई है बल्कि यह एक दीर्घकालिक निवेश है. भारत में फुटबॉल के विकास के मद्देनजर फीफा ने 2011 में अपना दक्षिण एशिया का क्षेत्रीय कार्यालय, जो श्रीलंका में वर्षों से कार्यरत था, नई दिल्ली स्थानांतरित कर दिया है. यह इस बात का सूचक है कि फीफा भारत में चल रही योजनाओं पर सीधे तौर पर नजर रखना चाहता है जिससे कि कम से कम समय में भारत में फुटबॉल को ज्यादा से ज्यादा लोकप्रिय बनाया जा सके. एशिया में फीफा की वरीयता सूची में भारत पहले नंबर पर है. फीफा भारत में यूथ ओरिएन्टेड फुटबॉल डेवलपमेंट प्रोग्राम चला रहा है. द विन इन इंडिया विथ इंडिया नाम से चलाए जा रहे कार्यक्रम के अंतर्गत फीफा ने भारत के सात विभिन्न जोनों में तकनीकी(टेक्निकल) सेंटरों और आठ कृत्रिम टर्फ के निर्माण के लिए 80 लाख अमेरिकी डॉलर खर्च किए हैं. इसके अलावा फीफा ने वर्ष 2012 में प्रोजेक्ट गोल के अंतर्गत दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरू में चार क्षेत्रीय अकादमी के निर्माण के लिए अतिरिक्त फंड उपलब्ध कराया. इन आधारभूत कार्यक्रमों के अलावा फीफा कोचों को प्रशिक्षित करने के लिए भी एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है. क्षेत्रीय अकादमियों में जनवरी 1999 के बाद जन्म लेने वाले खिलाड़ियों को जगह दी गई है जिससे की वे भविष्य में भारतीय फुटबॉल को शिखर पर ले जाने में अपना योगदान दे सकें. एक मुख्य अकादमी के अलावा पांच अतिरिक्त अकादमियों के 2013 में खोले जाने की योजना थी इन अकादमियों का मुख्य लक्ष्य एएफसी कप और फीफा विश्‍व कप जैसी प्रतियोगिताओं के लिए सभी आयु वर्ग के खिलाड़ियों को तैयार करना है. इंफ्रास्ट्रकचर उपलब्ध कराने के अलावा भारतीय युवा खिलाड़ियों को ज्यादा से ज्यादा मैच खेलने का अनुभव देना भी जरूरी है वह भी तब जब भारत की अंडर-16 राष्ट्रीय टीम 2007 और 2011 में एएफसी टूर्नामेंट में क्वालीफाई करने में सफल रही है. इसके लिए भी फीफा काम कर रहा है. इसी कड़ी में भारत को 2017 में होने वाले अंडर -17 विश्‍वकप का मेजबान बनाया गया है. इसके अलावा भारत 2015 और 2016 में सीनियर स्तर पर होने वाली क्लब चैंपियनशिप की मेजबानी के लिए भी अपनी दावेदारी पेश करने जा रहा है. इस बात की पूरी संभावना है कि फीफा भविष्य के फायदों को ध्यान में रखते हुए मेजबानी करने का मौका भारत को दे. भारत को युवाओं का देश कहा जाता है. दुनिया की 13 प्रतिशत आबादी फुटबॉल के ग्लैमर से अब तक अछूती है. भारत जैसे देश में क्रिकेट को धर्म का दर्जा प्राप्त है जो स्थिति ब्राजील में फुटबॉल की है कुछ ऐसा हाल ही भारत में क्रिकेट का है. जिस तरह ब्राजील में हर कोई फुटबॉल खिलाड़ी बनने का सपना संजोता है उसी तरह भारत में हर कोई क्रिकेट खिलाड़ी बनने का सपना देखता है. ऐसे में भारत में फुटबॉल की जड़ें जमाना आसान नहीं होगा. युवाओं के जिस पूल से फुटबॉल खिलाड़ी निकालने हैं वो क्रिकेट के दीवाने हैं. जब तक युवाओं को उनका करियर पेशेवर फुटबॉल खिलाड़ी के रूप में फलता-फूलता नहीं दिखाई देगा तब तक वे फुटबॉल को गंभीरता से नहीं लेंगे और उसकी तरफ रुख नहीं करेंगे. चीन दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश है जहां फुटबॉल लोकप्रिय हो चुका है. इस सूची में भारत का नाम ही मिसिंग है. भारत जैसे दुनिया की सबसे अधिक युवा आबादी वाले देश में फुटबॉल को लोकप्रिय बनाने की अपार संभावनाएं हैं. फीफा के लिए यह एक बड़ी चुनौती भी है. क्योंकि भारत में फुटबॉल को लोकप्रिय बनाए बिना वह रेवेन्यू में इज़ाफा नहीं कर सकता है. यूरोप और अमेरिकी देशों के खेल बाजार में सेचुरेशन की स्थिति आ गई है. दुनिया का हर एक खेल संगठन भारत की ओर रुख कर रहा है. ये उनकी मजबूरी है. दुनिया के कई देश एक साथ मिलकर भी भारत जितना बड़ा खेल बाज़ार उपलब्ध नहीं करा सकते हैं. इसलिए वे भारत को हर मामले में सर्वोच्च वरीयता देने लगे हैं. इसी वजह से भारत को अंडर-17 विश्‍वकप की मेजबानी दिए जाने की पहल फीफा के आलाधिकारियों ने ही की थी. खैर, भारत को 2017 में होने वाले अंडर-17 फीफा विश्‍वकप की मेजबानी मिल गई है. जब सारी दुनियां की नज़रें 2014 में ब्राजील में होने वाले विश्‍वकप के संभावित विजेता के ऊपर टिकी हुई है. तब भारत के 2022 में कतर में होने वाले फीफा विश्‍वकप में क्वालीफाई करने पर अटकलें लगने लगी हैं. भारत ने मेजबानी की दौड़ में शामिल अन्य देशों दक्षिण अफ्रीका, आयरलैंड और उज्बेकिस्तान को पीछे छोड़ा और प्रत्येक दो वर्ष में होने वाले 24 देशों के इस टूर्नामेंट के आयोजन का अधिकार पाया. मेजबान देश होने के कारण भारत अपने इतिहास में पहली बार इस टूर्नामेंट में भाग लेगा. यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या भारत इस मौके को विश्‍व फुटबॉल पटल पर स्थापित करने के लिए उपयोग कर पाएगा? क्या फीफा का पहला दांव सफल होगा? अंडर-17 विश्‍व कप के आयोजन में अभी तीन साल हैं. इन तीन सालों में भारत को जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना है, साथ ही खिलाड़ियों का एक ऐसा पूल बनाना है जो पेशेवर भी हों और प्रतिभाशाली भी जो कि ब्राजील, जर्मनी और स्पेन जैसी टीमों के साथ दो-दो हाथ करने का माद्दा रखते हों और भारत को फुटबॉल के शिखर पर भी पहुंचा सकें. जिससे न केवल देश के लोगों के दिलो-दिमाग पर छाए रहने वाले क्रिकेट का मायाजाल भंग हो और भारतीय युवा विश्‍व के सबसे लोकप्रिय खेल की ओर रुख करें. देश में फुटबॉल का कायाकल्प करने की प्राथमिक जिम्मेदारी अखिल भारतीय फुटबॉल संघ (एआईएफएफ) की है जिसके कंधों पर भारतीय फुटबॉल के विकास का पूरा भार है. भारत सरकार उसका केवल बाहर से सहयोग कर सकती है. लंबे इंतजार के बाद हाथ में आए इस मौके को किस रणनीति के तहत एआईएफएफ किस तरह उपयोग करता है यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन वह तीन साल के थोड़े से वक्त में किस तरह इस आयोजन को सफल बना पाएगा, यह देखना दिलचस्प होगा. भारत को इस बड़े टूर्नामेंट की मेजबानी छह से आठ शहरों में करनी होगी. नई दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, गुवाहाटी, मडगांव, कोच्चि और बेंगलुरु आदि शहर मेजबान हो सकते हैं. क्योंकि इन शहरों में पहले से ही फुटबॉल के मैदान हैं. उपलब्ध खेल मैदानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं उपलब्ध कराना, नई सुविधाएं डेवलप करने से बेहतर विकल्प है. लेकिन मैंगलोर में फुटबॉल मैच से ठीक पहले दर्शक दीर्घा का ढह जाना भी पहले से स्थापित इंन्फ्रास्ट्रक्चर की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करता है. नई सुविधाएं विकसित करने की बात सामने आते ही राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान हुए घोटालों की तस्वीर सामने आ जाती है, जहां समय रहते कोई भी काम पूरा नहीं हो सका था. अंडर-17 विश्वकप की तैयारी के लिए जो वक्त है वह राष्ट्रमंडल खेलों की तुलना में बेहद कम है. फीफा को भारत में फुटबाल के विकास की अपार संभावनाएं नज़र आती हैं. फीफा का मानना है कि यदि भारत इस टूर्नामेंट का आयोजन करेगा, तो स्वाभाविक रूप से इस खेल को देश में लोकप्रिय बनाने में मदद मिलेगी. भारत के लिए मेजबानी हासिल करने की राह आसान नहीं रही. जनवरी में भारत की शुरुआती बोली नामंजूर कर दी गई, क्योंकि फीफा सरकार से कई विषयों पर स्पष्ट गारंटी चाहता था. सरकार से गारंटी मिलने के बाद एक प्रकार से पूर्वनियोजित तरीके से भारत को मेजबान घोषित कर दिया गया. फीफा के अलावा अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल क्लबों ने भी भारतीय बाजार पर कब्जा करने का फैसला किया है. मैनेचेस्टर यूनाइटेड और आर्सेनल जैसे क्लबों ने भारत में फुटबॉल स्कूल खोले हैं. मैनेचेस्टर युनाइटेड ने वर्ष 2011 में मुंबई में और आर्सेनल ने दिल्ली में फुटबॉल प्रशिक्षण स्कूल खोले हैं. कुछ यूरोपीय क्लबों ने पहले से कार्य कर रहे फुटबॉल स्कूलों के साथ समझौते किए हैं. स्पेनिश क्लब रियल मैड्रिड ने कोलकाता में फुटबॉल अकादमी खोलने का निर्णय लिया है. पिछले साल अक्टूबर में लीवरपूल ने महाराष्ट्र के पुणे में फुटबॉल स्कूल की शुरुआत की है, जो कि सर्वसुविधायुक्त है. यह स्कूल 18 से 19 वर्ष तक के भारतीय खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करेगा. बायर्न म्युनिख और चेल्सी जैसे क्लबों में भी भारत में निवेश करने संबंधी बातें हो रही हैं. भारतीय खिलाड़ी भी विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं. हाल ही में भारतीय टीम के गोलकीपर सुब्रतो पॉल किसी यूरोपीय प्रथम श्रेणी टीम की ओर से खेलने वाले पहले भारतीय बने हैं. उन्हें डेनमार्क के वेस्ट्स्जालैंड क्लब की ओर से खेलने का मौका मिला है. इस क्लब को एफसी वाइकिंग्स के नाम से भी जाना जाता है. पिछले साल भारतीय कप्तान सुनील क्षेत्री को भी पुर्तगाल के स्पोर्टिंग क्लब लिस्बन की ओर से बी लीग में खेलने का मौका मिला था. यह एक तरह से अंतरराष्ट्रीय भारतीय फुटबॉल स्टार बनाने की कवायद है जिसे धीरे-धीरे अंजाम तक पहुंचाया जा रहा है. एक साथ बहुत से क्लबों में भारतीयों की उपस्थिति कई सवाल खड़े कर सकती है. इसलिए इस योजना पर धीरे-धीरे काम हो रहा है. कुछ सालों से दुनियाभर के अधिकांश खेल आयोजन ब्रिक्स देशों(ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) में हो रहे हैं. जैसे कि 2008 के ओलंपिक चीन के बीजिंग में, 2010 में राष्ट्रमंडल खेल भारत के नई दिल्ली में, 2010 के एशियाई खेल चीन के ग्वांगजू में, 2010 में फीफा विश्‍वकप दक्षिण अफ्रीका में, 2014 में शीतकालीन ओलंपिक सोची (रूस) में, 2014 का फीफा विश्‍वकप ब्राजील में, 2018 का फीफा विश्‍वकप रूस में, 2016 के ओलंपिक रियो डि जेनेरियो ब्राजील में आयाजित हो रहे हैं. दुनिया में खेलों का पहिया इन्हीं पांच देशों के इर्द गिर्द होकर गुजर रहा है. इसलिए बड़े खेल आयोजनों के लिए भारत को तैयार करना पश्‍चिमी देशों की मजबूरी है. क्योंकि 2004 में एथेंस ओलंपिक के आयोजन के बाद ग्रीस की अर्थव्यवस्था के ल़डख़डा जाने के बाद यूरोपीय देश इस तरह के आयोजनों से बचते दिख रहे हैं. कम समय अंतराल पर एक देश को दोबारा इन खेलों का मेजबान भी नहीं बनाया जा सकता है. इसलिए भारत को जल्दी ही बलि का बकरा बनाने के लिए नीतिगत तौर पर तैयारी हो रही है. राष्ट्रगौरव के नाम पर खेलों का आयोजन करना देश के लोगों के लिए कैसा होता है, इसे ब्राजील में साफ तौर पर देखा जा सकता है. ब्राजील में फुटबॉल विश्‍वकप और ओलंपिक खेलों के आयोजन को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि सुदृढ़ अर्थव्यवस्था भारत जैसे देश को प्रतियोगिता का मेजबान बना सकने में सहायक हो सकती है, लेकिन खेल का स्तर सुधारने के लिए व्यापक बदलाव करने होंगे. फीफा किसी तरह इस बात को सुनिश्‍चित करने में लगा है कि भारत फुटबॉल के मैदान में एक बार फिर से अपने चरम पर या उससे बेहतर स्थिति में पहुंचे. दोनों परिस्थितियों में दोनों पक्षों की जीत होगी. फीफा भारतीय फुटबॉल के उत्थान के नाम पर भारतीय बाज़ार का दोहन करने की तैयारी में जुटा है और भारत फुटबॉल की दुनिया में अपने सितारों को चमकते देखना चाहता है. यही दोनों को भारतीय फुटबॉल के कायाकल्प के लिए प्रेरित कर रहा है. यहां सबके अपने स्वार्थ हैं.

फुटबॉल का बा़जीगर

क्रिस्टियानो रोनाल्डो एक ऐसा नाम है, जो हाथ से नहीं, पैरों से जादू करता है. ऐसा खिलाड़ी, जिसके पास धार भी है और रफ्तार भी. इस खिलाड़ी की तेज ड्रिबल और तूफानी रफ्तार का हर फुटबॉल प्रेमी दीवाना है तो डी में मिलने वाले क्रॉस पर बेहद चतुराई से किए गए गोल पर हर प्रतिद्वंद्वी बेबस. रोनाल्डो के खेल की असली परीक्षा ब्राजील में होने वाले फुटबॉल विश्‍व कप में होगी, जहां उनके ऊपर देश का विश्‍व विजेता बनाने का दबाव होगा तो बराबर की टक्कर में खड़े मेसी से आगे निकलने की जोर आजमाइश भी. पुर्तगाली खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने आखिरकार फुटबॉल के बादशाह लॉयोनेल मेसी से उनका ताज छीन ही लिया. रोनाल्डो को फीफा ने वर्ष 2013 का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी घोषित करते हुए बैलॉन डिऑर के खिताब से सम्मानित किया. पुर्तगाल की ऐतिहासिक पहचान लहरों से खेलने वालों की है, लेकिन एक पुर्तगाली(क्रिस्टियानो रोनाल्डो) फुटबॉल के मैदान में लहरों की तरह लहराता दिखाई देता है. फिलहाल उसे रोक पाना किसी के वश में नहीं है. वह गोल पर गोल दागता जा रहा है और सफलता के नये आयाम रचता जा रहा है. विश्व फुटबॉल जगत में अर्जेंटीना के लॉयोनेल मेसी ही एकमात्र खिलाड़ी हैं, जो उन्हें सीधे तौर पर चुनौती देते नजर आते हैं. आज से चार साल पहले 2008 में रोनाल्डो पहली बार फीफा प्लेयर ऑफ द् इयर चुने गए थे. उस समय चैंपियंस लीग में मैनचेस्टर यूनाइटेड की जीत का सेहरा उन्हीं के सिर बंधा था. इस बार रोनाल्डो को कुल 27.99 और मेसी को 24.72 प्रतिशत वोट मिले. तीसरे स्थान पर बायर्न म्यूनिख के फ्रांसीसी खिलाड़ी फ्रांक रिबेरी रहे. उन्हें 23.99 फीसद वोट हासिल हुए. 2008 के बाद लगातार चार साल मेसी के नाम रहे. मेसी 2009 से 2012 तक लगातार चार बार फीफा प्लेयर ऑफ द इयर चुने गए. मेसी बेहतरीन ड्रिबलिंग का जादू दिखाते रहे और दनादन गोल करते रहे. नतीजतन वे विश्व फुटबॉल के नये बादशाह बन गए. रोनाल्डो हर साल सर्वश्रेष्ठ फुटबॉलर के अवॉर्ड से चंद कदम की दूरी पर रह जाते थे. रोनाल्डो को जीतना पसंद है, इसलिए उन्होंने हार नहीं मानी. इस दौरान मेसी इतिहास बन रहे थे और रोनाल्डो उस इतिहास को चुनौती दे रहे थे. हार कर जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं और रोनाल्डो ने बाजी जीतकर खुद को फुटबॉल जगत का बाजीगर साबित कर दिया है. इस साल मेसी चोट की वजह से कई बार मैदान के बाहर बैठना पड़ा है. इस वजह से ही अटकलें लग रहीं थीं कि शायद मेसी लगातार पांचवीं बार बैलॉन डिऑर के खिताब पर कब्जा नहीं कर पाएंगे. रोनाल्डो इस राह में सबसे बड़ा रोडा हैं और वह बेहतरीन फुटबॉल खेल रहे हैं. रोनाल्डो ने वर्ष 2013 में कुल 59 मैच खेले. इस दरमियान उन्होंने आठ मैंचों में हैट्रिक लगाई और कुल 69 गोल किए. पिछले साल रोनाल्डो हर मैच में औसतन एक गोल (1.1%) कर रहे थे. उनका प्रत्येक गोल उन्हें सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के खिताब की ओर ले जा रहा था. रोनाल्डो ने पिछले कुछ सीजन बहुत कंसिसटेंट प्रदर्शन किया. इस वजह से उनका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ था और वह बेहतरीन फॉर्म में नज़र आए. फिलहाल रोनाल्डो अपने खेल के चरम पर हैं. वह दुनिया के सबसे मंहगे फुटबॉल खिलाड़ी हैं. रियाल ने 2009 में लगभग 10 करोड़ यूरो (800करोड़ रुपये) में रोनाल्डो को खरीदा, जो फुटबॉल के इतिहास के सबसे महंगे सौदों में गिना जाता है. जब वह इंग्लिश क्लब मैंचेस्टर यूनाइटेड ट्रांसफर होकर रियल मैड्रिड पहुंचे, तब से उन्हें अनुबंध के तहत फीस के रूप में सालान लगभग 170 करोड़ रुपये मिल रहे हैं. रियाल मैड्रिड में आते ही रोनाल्डो गोल मशीन में तब्दील हो गए. रीयाल के लिए खेलते हुए उन्होंने 2009-10 सीजन में 33, 2010-11 में 54, 2011-12 में 60 और 2012-13 में 69 गोल किए. यह ट्रेंड बताता है कि समय के साथ उनके खेल में सुधार हुआ है. यदि ऐसा ही चलता रहा तो वे मेसी से आगे निकलकर सफलता के नये मुकाम पर पहुंचेंगे. यूरो-2012 में रोनाल्डो अपने दम पर टीम को सेमीफाइनल तक ले गए. स्पेन भले ही चैंपियन बना, लेकिन रोनाल्डो की अगुवाई में सेमीफाइनल में पुर्तगाल ने उसकी हालत खस्ता कर दी थी. रोनाल्डो एंड कंपनी ने स्पेन को नचा दिया. पेनल्टी से निकले नतीजे में स्पेन भाग्यशाली साबित हुआ. उनकी मदद से रियाल ने पिछले साल ला लीगा का खिताब जीता और उनकी टीम चैंपियंस लीग के सेमीफाइनल तक पहुंची. हफ्ते दर हफ्ते रोनाल्डो ने विशाल चुनौतियों का सामना किया. उन्होंने बेहद खराब परिस्थितियों में भी टीम के लिए गोल किए और टीम को संकट से निकालकर जीत के रास्ते पर लाए. रोनाल्डो 2003 से पुर्तगाल की राष्ट्रीय टीम का हिस्सा हैं. उनके पास दो फीफा विश्व कप खेलने का अनुभव है. उन्होंने अब तक पुर्तगाल के लिए कुल 109 मैच खेले हैं और कुल 47 गोल किए हैं. विश्व कप में वह केवल दो गोल कर सके हैं. एक गोल उन्होंने 2006 के विश्व कप में और दूसरा 2010 के विश्व कप में किया था. वह संयुक्त रूप से पुर्तगाल के लिए सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी हैं. वे सबसे कम उम्र में 100 मैचों में देश का प्रतिनिधत्व करने वाले तीसरे यूरोपीय खिलाड़ी हैं. फिलहाल दुनिया में प्रशंसकों दो धड़े में बटे हुए हैं या तो वे मेसी के प्रशंसक हैं या रोनाल्डो के. प्रशंसकों का मानना है कि रोनाल्डो बतौर खिलाड़ी मेसी से बेहतर हैं. मेसी के साथ मैदान पर दुनिया के और भी बेहतरीन खिलाड़ी खेल रहे होते हैं. उनके खेल का फायदा भी मेसी को गोल के रूप में मिल जाता है. इसलिए गोल स्कोर करने के मामले में मेसी उनसे आगे दिखाई पड़ते हैं. रोनाल्डो में एक औसत टीम में भी जान फूंकने की क्षमता है. वे अपने कौशल के दम पर गोल करने के मौके बनाते हैं. यह एक खिलाड़ी के रूप में उन्हें स्थापित करता है. अधिकांश लोग मेसी को एक अहंकारी व्यक्ति मानते हैं. रोनाल्डो से इस बारे में पूछने पर वे कहते हैं कि हमेशा जीतना पसंद है. इसके लिए मैं हर संभव कोशिश करता हूं. शायद इसी वजह से लोगों को मैं घमंडी लगता हूं. मैं ज्यादातर अपने करीबियों और दोस्तों के साथ रहना पसंद करता हूं. फुटबॉल से मुझे बहुत लगाव है, इसलिए मैदान पर मैं सिर्फ जीत दर्ज करने लिए जाता हूं. इसलिए यदि लोग मुझे एरोगेंट कहें तो मुझे कोई परवाह नहीं है. मेसी की पहचान विनम्र स्वभाव के आक्रामक खिलाड़ी की है. प्रशंसक और पत्रकार उन्हें बेहद पसंद करते हैं. रोनाल्डो को लगता है कि कुछ लोग इसी वजह से मेसी के पक्ष में वोट कर देते हैं, जबकि वोटिंग के दौरान पिछले साल इस खिलाड़ी ने खेल के मैदान पर क्या किया, इस आधार पर वोट पड़ने चाहिए. जैसे कि उसने अपनी टीम के लिए कितने मैच जीते, अपनी टीम को कौन कौन से खिताब जिताए. इन बातों का वोट देते वक्त ख्याल किया जाना चाहिए. गौरतलब हो कि फीफा के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का चुनाव राष्ट्रीय कोचों, राष्ट्रीय टीमों के कप्तानों और वैश्‍विक मीडिया के सदस्यों के वोटों से होता है. इन वोटों के मामलों में कई बार रोनाल्डो पीछे रह जाते हैं. रोनाल्डो का बैलॉन डिऑर के बार में कहना है कि निश्‍चित तौर पर इसे जीतना अच्छा लगता है, लेकिन इसके साथ ही दुनिया नहीं खत्म हो जाती. कई बार महान खिलाड़ियों को भी यह पुरस्कार नहीं मिला है, इसलिए अफसोस नहीं करना चाहिए. रोनाल्डो 2003 से पुर्तगाल की राष्ट्रीय टीम का हिस्सा हैं. उनके पास दो फीफा विश्व कप खेलने का अनुभव है. उन्होंने अब तक पुर्तगाल के लिए कुल 109 मैच खेले हैं और कुल 47 गोल किए हैं. विश्व कप में वह केवल दो गोल कर सके हैं. एक गोल उन्होंने 2006 के विश्व कप में और दूसरा 2010 के विश्वकप में किया था. वह संयुक्त रूप से पुर्तगाल के लिए सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी हैं. वे सबसे कम उम्र में 100 मैचों में देश का प्रतिनिधत्व करने वाले तीसरे यूरोपीय खिलाड़ी हैं. उनके पास फुटबॉल खेलने का एक दशक का अनुभव है. इस साल ब्राजील में होने वाले विश्व कप में उनकी प्रतिष्ठा दांव पर रहेगी. साथ ही उनके पास उनके पास खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने का भी बेहतरीन मौका है. क्लब स्तर पर रोनाल्डो और मेसी दोनों बेहद सफल रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर दोनों ही खिलाड़ी बौने से नज़र आते हैं. रोनाल्डो अपने खेल के सबसे बेहतरीन दौर से गुजर रहे हैं. वह पुर्तगाल के कप्तान भी हैं. अपने कप्तान पर पुर्तगालियों को भरोसा है कि वही विश्व कप में उनकी नौका को पार लगा सकते हैं. एक परिपक्व और अनुभवी कप्तान से विश्व कप की आशा करना बेमानी नहीं है. देशवासियों की आशाओं का बोझ कंधों पर लिए रोनाल्डो कैसे विश्व चैंपियन बनते हैं, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा. यदि रोनाल्डो ऐसा करने में कामयाब होते हैं तो वह मेसी से बहुत आगे पहुंच जाएंगे. आशा है कि उनके प्रदर्शन का यह दौर चलता रहेगा और इस साल ब्राजील में होने वाले फीफा विश्व कप में वो दनादन गोल करते दिखाई देंगे.

सर्वश्रेष्ठ भारतीय एथलीट

भारत ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धाओं में हमेशा से पदकों के लिए तरसता रहा है. भारत के सर्वकालिक महान एथलीटों में शुमार फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह और उडन परी पी टी ऊषा जो नहीं कर पाए, वह कारनामा अंजू बॉबी जॉर्ज ने कर दिखाया है. क्या अंजू भारत की सर्वश्रेष्ठ एथलीट हैं? बड़ी ख़ामोशी और प्रशंसकों की ग़ैर-मौजूदगी में वर्ष 2005 में मोनेको में वर्ल्ड एथलेटिक्स फाइनल मुक़ाबले में अंजू बॉबी जॉर्ज को मिला रजत पदक अब स्वर्ण में बदल गया है. इस तरह अंजू किसी विश्‍व स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय एथलीट बन गईं हैं. फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह और उड़न परी पी टी ऊषा जो नहीं कर पाए, दरअसल वह कारनामा अंजू बॉबी जॉर्ज ने कर दिखाया है. वर्ष 2005 में मोनेको में महिलाओं की लंबी कूद स्पर्धा में रूसी खिलाड़ी तत्याना कुतोवा ने 6.83 मीटर लंबी छलांग लगाकर स्वर्ण पदक पर क़ब्ज़ा किया था. वहीं अंजू 6.75 मीटर लंबी छलांग लगाकर दूसरे स्थान पर रहीं और उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा था. हालांकि, वह दौर अंजू के करियर का सर्वश्रेष्ठ दौर था. अंजू अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन कर रहीं थीं. वर्ष 2003 में अंजू पेरिस में आयोजित विश्‍व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनी थी. उसके बाद वर्ष 2004 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सबसे बड़े खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न से सम्मानित किया था. अंजू उस दौर की एक अविवादित एथलीट थीं, जिनके करियर पर किसी भी तरह का दाग़ नहीं लगा था. कहते हैं भगवान के घर में देर है, लेकिन अंधेर नहीं. जिस खेल भावना के साथ अंजू खेलीं, अंततः उसका सकारात्मक परिणाम निकला और आठ साल बाद अंजू का विश्‍व चैंपियन बनने का सपना पूरा हुआ. वैसे उनकी इस उपलब्धि के बाद यह बहस भी छिड़ गई कि भारत का सर्वकालिक एथलीट कौन है? आइएएएफ के फैसले से कोटोवा के अयोग्य घोषित होने के बाद के बाद नई रैंकिंग इस प्रकार हैं. स्वर्ण पदक – अंजू बॉबी जॉर्ज (भारत , 6.75 मीटर) रजत पदक – अनुग्रह उपसा (अमरीका, 6.67 मीटर) कांस्य पदक – ईयूनिस नाई (फ्रांस , 6.51मीटर) यदि आपको किसी लोकप्रिय भारतीय एथलीट का नाम लेने को कहा जाए, तो सबसे पहले आपके जेहन में मिल्खा सिंह और पीटी ऊषा का नाम आता है. दोनों ने ही ब़हुत मुश्किलों का सामना करते हुए दुनिया भर में भारत का परचम लहराया था. दोनों ही खिलाड़ी ओलंपिक पदक जीतने से महज कुछ दूरी पर रह गए. उड़न सिख के नाम से विख्यात मिल्खा सिंह वर्ष 1960 के रोम ओलंपिक में चौथे स्थान पर रहे थे. तब उनका नाम पदक जीत सकने वालों की सूची में सबसे ऊपर था. हर किसी को आशा थी कि मिल्खा सिंह भारत के लिए पदक जीतेंगे, लेकिन वह चूक गए. वैसे मिल्खा सिंह ने अपने करियर में तीन ओलंपिक खेलों में भाग लिया, लेकिन वह कोई पदक नहीं जीत सके. हालांकि, राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों में उनका दबदबा बना रहा. उन्होंने वर्ष 1958 में टोकियो में 200 मीटर और 400 मीटर स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीता था. मिल्खा सिंह ने एशियाई खेलों में कुल चार स्वर्ण पदक जीते थे. कहा जाता है कि मिल्खा सिंह ने अपने जीवन में कुल 80 प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया और 77 मुक़ाबले में उन्हें जीत मिली थी. भारत में उड़न परी के नाम से मशहूर पीटी ऊषा ने भारत के लिए कई ख़िताब जीते, जिस पर देश को हमेशा गर्व रहेगा. पीटी ऊषा पहली बार वर्ष 1980 में मॉस्को ओलंपिक में हिस्सा लिया था. मॉस्को ओलंपिक में वह पदक जीतने में भले ही सफल नहीं हुईं, लेकिन वह अपनी छाप छोड़ने में कामयाब ज़रूर हुई थीं. वर्ष 1982 के दिल्ली एशियाई खेलों में उन्होंने 100 मीटर और 200 मीटर की स्पर्धाओं में रजत पदक जीतकर यह साबित कर दिया कि वह आने वाले समय में वह एक बड़ी खिलाड़ी बनेंगी. उसके बाद कतर में वर्ष 1983 में ट्रैक एंड फील्ड प्रतियोगिता में उन्होंने 400 मीटर स्पर्धा का स्वर्ण पदक जीता. 1984 में लॉस एंजिल्स में संपन्न हुए ओलंपिक खेलों में उन्होंने 400 मीटर बाधा दौड़ के सेमीफाइनल में पहला स्थान प्राप्त किया था. इसी के साथ वह ओलंपिक के फाइनल मुक़ाबले में पहुंचने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनीं. हालांकि, फाइनल मुक़ाबले में वह कांस्य पदक जीतने से चूक गईं. इसके बाद भी ऊषा ने हार नहीं मानी और उन्होंने अपनी मेहनत जारी रखी. वर्ष 1986 में सियोल एशियाई खेलों में पीटी ऊषा ने 4 स्वर्ण और 1 रजत पदक जीता था. उन्हें एशियाई खेलों का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी घोषित किया गया था. उन्होंने वर्ष 1984 से लेकर 1989 तक एशियाई ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धाओं में 13 स्वर्ण पदक जीते थे. वह 1984 से 1989 तक पांच बार सर्वश्रेष्ठ एशियाई खिलाड़ी और 1984 एवं 1985 में विश्‍व की सर्वश्रेष्ठ एथलीट चुनी गईं थीं. हालांकि पीटी ऊषा ओलंपिक में कोई पदक नहीं जीत सकीं, लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिभा से लोगों का दिल जीत लिया. वहीं अंजू बॉबी जॉर्ज अपने करियर की शृरूआत में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परचम लहराना शुरू कर दिया था. अंजू ने वर्ष 2002 में मैनचेस्टर राष्ट्रमंडल खेलों में लंबी कूद का कांस्य पदक जीता था. इसके बाद वर्ष 2002 में हुए बुसान एशियाई खेलों में लंबी कूद का स्वर्ण पदक पर भी क़ब्ज़ा किया. बुसान के फॉर्म को अंजू ने आगे भी बरकरार रखते हुए वर्ष 2003 में पेरिस वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीत कर इतिहास रच दिया. ऐसा करने वाली वह पहली भारतीय एथलीट बनीं. वर्ष 2005 में मोनेको में हुए वर्ल्ड एथलेटिकस फाइनल में उन्होंने अपना परचम लहराया और रजत पदक जीतने में कामयाब हुईं. इसी के साथ दुनिया भर में अंजू मशहूर खिलाड़ी बन गई. वर्ष 2004 के एथेंस ओलंपिक में उन्हें छठा स्थान प्राप्त हुआ. वैसे वह विश्‍व चैंपियनशिप में किए अपने कारनामे को दोहराने में असफल रहीं. उसके बाद कोरिया के इचोहेन में हुई एशियन चैंपियनशिप में भी उन्होंने स्वर्ण पदक जीता, लेकिन 2006 में दोहा एशियाई खेलों में उन्हें रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा. अंजू इसके बाद किसी भी विश्‍व चैंपियनशिप में पदक नहीं जीत पाईं. अंजू बॉबी जॉर्ज की उपलब्धियां अंजू बॉबी जॉर्ज वर्ष 2003 में पेरिस में आयोजित विश्‍व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनी थी. उन्हें वर्ष 2003 में अर्जुन पुरस्कार और वर्ष 2004 में राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार प्रदान किया गया था. वर्ष 2004 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया. ग़ौरतलब है कि वर्ष 2007 के आईएएएफ रैंकिग में उन्हें चौथा स्थान मिला. विश्‍व रैंकिंग के टॉप फाइव में जगह पाने वाली वह पहली भारतीय एथलीट थीं. अंजू वर्ष 2001 से 2003 के अंतराल में विश्‍व रैंकिंग में 61 पायदान से 6 वें पायदान पर पहुंची थीं. अंजू ने अपने पूरे करियर के दौरान कड़ी मेहनत की और उस मुकाम पर पहुंची, जहां हर कोई पहुंचना चाहता है. देर से ही सही पर उन्हें विश्‍व चैंपियन का ख़िताब हासिल हुआ. उल्लेखनीय है कि वर्ष 2004 के ओलंपिक से लेकर अब तक के सैंपल की एक बार फिर से जांच करने का फैसला आईएएएफ ने किया है. हो सकता है कि भविष्य में अंजू बॉबी जार्ज ओलंपिक पदक विजेता भी बन जाए. अगर वह ओलंपिक पदक जीतने में कामयाब नहीं होती हैं, तब भी उनका नाम भारत के सर्वकालिक महान एथलीटों में शामिल रहेगा. डोपिंग के जाल से बचकर अंजू बॉबी जार्ज ने बिना विचलित हुए जो कारनामा कर दिखाया है, वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है. मिल्खा सिंह और पीटी ऊषा आज भी देश के उभरते हुए प्रतिभावान खिलाड़ियों के लिए एक आदर्श हैं. देश भर में लोग उन्हें जानते हैं और उनके जैसा बनना चाहते हैं. तीनों की उपब्धियों पर देश को गर्व है. हालांकि, अंजू इन दोनों महान खिलाड़ियों से एक कदम आगे बढ़ गई हैं, क्योंकि वह विश्‍व चैंपियन हैं. उन्होंने देश वासियों के लिए जो उपलब्धि हासिल की है, दरअसल वह अनमोल है. वैसे कोई भी खिलाड़ी एक-दूसरे से कमतर नहीं हैं. उन्होंने अपने-अपने समय में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. किसी विवाद में फंसे बग़ैर अंजू ने देश का मान बढ़ाया.

क्या ऐसे वर्ल्डकप जीतेगी टीम इंडिया!

कप्तान धोनी के क़रीबी होने की वजह से सुरेश रैना लगातार टीम में बने हुए हैं, जबकि दूसरे खिलाड़ियों को एक सीरीज में असफल रहने पर या नए खिलाड़ियों को मौक़ा दिए बिना ही टीम से बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है. ऐसे खिलाड़ियों की भी कमी नहीं है, जो घरेलू क्रिकेट में बेहतरीन प्रदर्शन कर लगातार टीम इंडिया के दरवाजे खटखटाते रहे हैं, लेकिन रैना न तो टीम से बाहर गए, न ही उन्हें कोई चेतावनी दी गई. रैना ने अपना पिछला शतक जनवरी 2010 में ढाका में श्रीलंका के ख़िलाफ़ लगाया था. क्रिकेट विश्‍वकप के आयोजन में तक़रीबन एक साल का वक्त बाकी है, लेकिन भारतीय टीम विश्‍व विजेता का खिताब बचाने के लिहाज से कतई काम करती नहीं दिख रही है. विदेशी धरती पर भारत का शर्मनाक प्रदर्शन जारी है. ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड एवं दक्षिण अफ्रीका के बाद न्यूजीलैंड, हर जगह भारतीय बल्लेबाज तेज गेंदबाजों के आगे घुटने टेकते नज़र आए. बल्लेबाजों का ढेर होना समझ में आता है, लेकिन तेज और स्विंग गेंदबाजों के लिए माकूल पिचों पर तेज गेंदबाजों का असफल होना टीम इंडिया के लिए चिंता का विषय है. वर्तमान में टीम इंडिया जैसा प्रदर्शन कर रही है, उसके बूते क्या वह अपना खिताब बचा पाएगी? दुनिया भर में अपनी बल्लेबाजी के दम पर डंका बजाने वाले भारतीय बल्लेबाजों का बैंड बज रहा है. ढेरों रन लुटाते गेंदबाज असहाय और भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी बगलें झांकते नज़र आ रहे हैं. कामयाबी के शिखर बैठे कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की अगुवाई में भारतीय टीम ने जब न्यूजीलैंड में क़दम रखा, तो ऐसा लगा कि इस बार इतिहास बदलेगा. धोनी ने कहा कि वह विदेशी दौरों पर अपना रिकॉर्ड सुधारना चाहते हैं, लेकिन एक पखवाड़ा गुजरा नहीं कि टीम की कलई खुल गई. भारतीय टीम एक बार फिर ढेर हो गई. विदेशी जमीं पर एक बार फिर हार का मुंह देखना पड़ा है. लगता है कि भारतीय खिलाड़ियों को खुद से ज़्यादा खुदा पर भरोसा हो गया है. विराट कोहली एवं मोहम्मद शमी को छोड़कर और किसी खिलाड़ी के प्रदर्शन में निरंतरता नहीं है. कैप्टन कूल भी भारतीय टीम की नैया पार नहीं लगा पा रहे हैं. विदेशी पिचों पर बतौर कप्तान असफल रहने का दाग दौरा दर दौरा गहराता जा रहा है. भारतीय बल्लेबाजों की हालत पस्त है. शिखर धवन, रोहित शर्मा, अजिंक्य रहाणे एवं सुरेश रैना का बल्ला लगातार विदेशी पिचों पर नाकाम हो रहा है. शिखर धवन ने चैंपियंस ट्रॉफी में अपने बल्ले का जौहर दिखाते हुए टीम इंडिया को चैंपियन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, लेकिन उसके बाद विदेशी धरती पर उनका बल्ला शांत ही रहा है. शिखर धवन ने अब तक भारत के लिए कुल 33 वनडे मैच खेले हैं. धवन ने 32 पारियों में 92.52 के धांसू स्ट्राइक रेट से कुल 1275 रन बनाए हैं. इस दौरान उनका उच्च स्कोर 119 रन रहा है, जिसमें उनके 5 शतक और 5 अर्द्धशतक शामिल हैं. वैसे तो शिखर धवन एक आला दर्जे के बल्लेबाज हैं, उन्होंने कई धमाकेदार पारियां भी खेली हैं, लेकिन पिछले कुछ मैचों में उनका जैसा प्रदर्शन रहा है, उससे सवाल उठना लाजिमी है. दक्षिण अफ्रीका के दौरे के दौरान धोनी ने गंभीर का नाम लिया था कि वह अभी भी उनकी योजनाओं में हैं. यदि धवन का बल्ला लगातार शांत रहता है, तो चयनकर्ता गंभीर को एक आख़िरी मौक़ा दे सकते हैं. यदि गंभीर को मौक़ा मिलता है, तो वह हाथ आए इस मौ़के को कतई खाली नहीं जाने देंगे. रणजी ट्रॉफी में गंभीर के खराब प्रदर्शन की वजह से शिखर कुछ दिन और शिखर पर बने रह सकते हैं. कोलकाता नाइट राइडर्स के कप्तान के रूप में गंभीर के पास वापसी करने का एक सुनहरा मौक़ा है. उससे पहले शिखर को सचेत हो जाना चाहिए. कप्तान धोनी के क़रीबी होने की वजह से सुरेश रैना लगातार टीम में बने हुए हैं, जबकि दूसरे खिलाड़ियों को एक सीरीज में असफल रहने पर या नए खिलाड़ियों को मौक़ा दिए बिना ही टीम से बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है. ऐसे खिलाड़ियों की भी कमी नहीं है, जो घरेलू क्रिकेट में बेहतरीन प्रदर्शन कर लगातार टीम इंडिया के दरवाजे खटखटाते रहे हैं, लेकिन रैना न तो टीम से बाहर गए, न ही उन्हें कोई चेतावनी दी गई. रैना ने अपना पिछला शतक जनवरी 2010 में ढाका में श्रीलंका के ख़िलाफ़ लगाया था. वहीं, रैना ने अपना पिछला अर्द्धशतक अगस्त 2013 में जिम्बॉब्वे के ख़िलाफ़ लगाया था. चेतेश्‍वर पुजारा देशी-विदेशी धरती पर अपनी तकनीक और बल्ले का लोहा मनवा चुके हैं. उन पर टेस्ट खिलाड़ी का टैग लगाकर लगातार एकदिवसीय टीम से बाहर रखा जा रहा है. तेज पिचों पर खेलने के लिए तकनीकी सुदृढ़ता चाहिए. बल्लेबाजी तकनीक के मामले में पुजारा कहीं से कमतर नहीं हैं. जिस तरह चयनकर्ताओं ने 2003 के विश्‍वकप से पहले हेमांग बदानी पर लक्ष्मण से ज़्यादा विश्‍वास जताया और उन्हें विश्‍वकप में खेलने का मौक़ा दिया था, भले ही टीम इंडिया तब फाइनल तक पहुंचने में कामयाब रही थी, लेकिन बदानी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा था. ठीक वैसी ही गलती इस बार पुजारा को नज़रअंदाज करके दोहराई जा रही है. चयनकर्ताओं को यह बात अपने जेहन में रखनी चाहिए कि अगला विश्‍वकप ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में होना है और भारतीय टीम को हमेशा यहां की पिचों पर मुंह की खानी पड़ी है. बावजूद इसके खिलाड़ियों को निजी संबंध और व्यक्तिगत पसंद के आधार पर जगह मिल रही है, तो यह बेहद चिंताजनक है. रोहित शर्मा ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ घरेलू सीरीज में धमाकेदार प्रदर्शन किया, तो लगा कि वह अपनी लय में आ गए हैं, उन्हें अपार प्रतिभा का धनी मानने वाले लोगों को लगा कि सचिन तेंदुलकर के संन्यास लेने के बाद भारतीय टीम को एक ऐसा खिलाड़ी मिल गया है, जो अकेले ही विपक्षी गेंदबाजों को लोहे के चने चबवा सकता है, लेकिन रोहित भी घरेलू विकेटों के रणबांकुरे बने रहे. लगभग सभी विदेशी दौरों पर उनका बल्ला खामोश ही रहा. अनियमित तौर पर यदा-कदा उनका बल्ला चला, लेकिन उन पर विश्‍वास जता पाना बेहद मुश्किल लगता है. उनकी बॉडी लैंग्वेज बेहद सुस्त दिखाई पड़ती है. इसी वजह से वह विदेशी विकेटों पर तालमेल बैठा पाने में असफल रहे हैं. एक आल राउंडर की तरह टीम में जगह पाने वाले रविंद्र जड़ेजा का बल्ला बीच-बीच में थोड़ी-बहुत चमक दिखा जाता है, लेकिन उनकी ये पारियां भारतीय टीम को जीत के मुहाने पर नहीं पहुंचा पाती हैं. वह एक स्पिन गेंदबाज हैं, जो बल्लेबाजी कर सकता है, यही उनकी पहचान है. उनका बल्ला उनकी फिरकी के सामने खामोश ही दिखाई पड़ता है. गेंदबाजी के दम पर जड़ेजा आईसीसी रैंकिंग में पहले पायदान पर भी पहुंच गए थे, लेकिन बतौर बल्लेबाज वह पूरी तरह असफल रहे हैं. लंबे समय बाद रविंद्र जड़ेजा ने न्यूजीलैंड में लगातार दो अर्द्धशतक लगाए, लेकिन भारत की डूबती नैया को वह नहीं बचा पाए. भले ही वह विश्‍वकप की टीम में जगह पा लें, लेकिन विषम परिस्थितियों में वह बतौर बल्लेबाज असफल ही साबित हुए हैं. गेंदबाजों का तो बहुत बुरा हाल है. देश हो या विदेश, गेंदबाज लगातार रन लुटाते रहे हैं और टीम की लुटिया डूबती रही है. घरेलू विकेटों पर बल्लेबाजों का बल्ला गेंदबाजों के घटिया प्रदर्शन पर पर्दा डाल देता है. विदेशी पिचों पर सभी की कलई खुल जाती है. तेज गेंदबाजों के लिए माकूल पिचों पर हमारे बल्लेबाज असहज और अप्रभावी हो जाते हैं. जिन पिचों पर विपक्षी गेंदबाज आग उगल रहे होते हैं, वहां हमारे गेंदबाज औसत दर्जे की गेंदबाजी करते हैं. उनकी गेंदबाजी अनियंत्रित और दिशाहीन हो जाती है, जिसका फायदा विपक्षी टीम के बल्लेबाज बेहतरीन तरीके से उठाते हैं और भारतीय टीम को मुंह की खानी पड़ती है. टीम में नए गेंदबाजों की जो खेप आई, जिसमें मोहम्मद शमी, उमेश यादव, वरुण ऐरोन, भुवनेश्‍वर कुमार, विनय कुमार एवं जयदेव उनदकर आदि शामिल हैं, में मोहम्मद शमी को छोड़कर कोई भी गेंदबाज स्थाई तौर पर टीम में जगह नहीं बना सका. इनमें से कोई एक सीरीज में अच्छा प्रदर्शन करता है, तो दूसरी में बदतर. युवा गेंदबाजों की मदद करने के लिए टीम में कोई अनुभवी गेंदबाज मौजूद नहीं है. जहीर बीसीसीआई के एकदिवसीय मैचों के प्लान में नहीं हैं. कप्तान धोनी जहीर खान को हालिया दक्षिण अफ्रीकी दौरे में एक बॉलिंग मेंटोर के रूप में ले गए थे. इससे ज़हीर खान की अहमियत का अंदाजा लग जाता है. गेंदबाज लगातार संघर्ष कर रहे हैं. 2015 में विश्‍वकप का खिताब बचाए रखने के लिए गेंदबाजी की समस्या का समाधान करना बेहद ज़रूरी है. गेंदबाजी भारतीय टीम की कमजोर कड़ी हमेशा से रही है. फिलहाल इसे मजबूती देने के लिए जहीर खान को टीम में बनाए रखना बेहद ज़रूरी हो गया है. यदि जहीर फिट हैं और टेस्ट मैचों में बेहतर गेंदबाजी कर रहे हैं, तो उन्हें बीसीसीआई किस आधार पर एकदिवसीय टीम में नहीं बनाए रखना चाहती है, यह समझ से परे है. ज़हीर खान की गैर मौजूदगी में टीम में सबसे सीनियर गेंदबाज ईशांत शर्मा हैं. ईशांत ने वर्ष 2008 में ऑस्ट्रेलियाई दौरे पर जो गेंदबाजी की थी, उसे देखकर लगा था कि भारतीय टीम को ज़हीर का उत्तराधिकारी मिल गया है, लेकिन ईशांत इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया एवं दक्षिण अफ्रीका, सभी विदेशी दौरों पर असफल रहे हैं. न्यूजीलैंड के ख़िलाफ़ हालिया सीरीज में दो मैचों में ईशांत ने 59 के औसत से महज 2 विकेट लिए. ईशांत एकादश में बने रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि वह टीम में ज़्यादा दिनों तक अपना स्थान सुरक्षित नहीं रख पाएंगे. उनकी इकॉनोमी और स्ट्राइक रेट सवालों के घेरे में है. फील्डिंग और बल्लेबाजी भी उनकी मदद करती नहीं दिख रही है. शायद उनके विकल्प के रूप में ही घरेलू क्रिकेट में बेहतरीन गेंदबाजी करने वाले ईश्‍वर पांडे को न्यूजीलैंड दौरे पर भेजा गया है, ताकि वह विश्‍वकप के लिहाज से तैयारी कर सकें और वहां की परिस्थितियों के बारे में समझ विकसित कर सकें. पिछले एक साल में मोहम्मद शमी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है. थोड़े से समय में वह टीम इंडिया की गेंदबाजी की धुरी बनकर उभरे हैं. अपने छोटे से अंतरराष्ट्रीय करियर में शमी ने 24 एकदिवसीय मैचों में लगभग 29 के औसत से 40 विकेट लिए हैं. जबकि उनका साथ दे रहे युवा भुवनेश्‍वर कुमार ने 30 मैचों में 33 विकेट लिए हैं. टीम में बतौर स्पिन गेंदबाज खेलने वाले अश्‍विन भी तेज पिचों पर बेअसर नज़र आ रहे हैं. बल्लेबाजी के दम पर वह ज़्यादा दिनों तक टीम में नहीं बने रह पाएंगे. बतौर गेंदबाज उनका प्रदर्शन दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैंड, दोनों में बेहद खराब रहा. दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ वह तीन एकदिवसीय मैचों में 169 रन खर्च करके केवल एक विकेट और न्यूजीलैंड सीरीज के पहले चार मैचों में 190 रन देकर केवल एक विकेट हासिल कर सके. अमित मिश्रा को जब-जब मौक़ा मिला है, उन्होंने अपनी उपयोगिता साबित की, लेकिन धोनी का क़रीबी होने का फायदा अश्‍विन को मिला और उन्हें अमित मिश्रा पर वरीयता मिली. तेज पिचों में किया गया प्रदर्शन उन्हें विश्‍वकप की टीम में जगह दिला पाने के लिए नाकाफी है. अब तक खेले गए 74 एकदिवसीय मैचों में अश्‍विन 33.86 के औसत से केवल 97 विकेट हासिल कर सके हैं. इन आंकड़ों को विश्‍वस्तरीय स्पिन गेंदबाजी के लिहाज से बेहतरीन नहीं कहा जा सकता. जबकि अमित मिश्रा ने अब तक खेले गए 21 मैचों में 23 के औसत से 37 विकेट हासिल किए. वह विदेशी धरती पर भी सफल रहे हैं. महेंद्र सिंह धोनी एक करिश्माई कप्तान हैं. उनकी कप्तानी का हर कोई कायल है. उनका आईसीसी प्रतियोगिताएं जीतने का रिकॉर्ड बहुत बेहतर है. इस वजह से उनसे पूरे देश को आशाएं हैं कि वह भारत को एक बार फिर से विश्‍व विजेता बनाएंगे. लेकिन, एक सेनापति तभी युद्ध जीत सकता है, जब उसके पास बेहतर युद्ध कौशल वाले सैनिक हों. यहां बतौर कप्तान धोनी को यह समझना होगा कि मेन इन यलो (चेन्नई सुपरकिंग्स) मेन इन ब्लू (टीम इंडिया) नहीं हो सकते हैं. उनकी जवाबदेही देश के प्रति है, न कि बीसीसीआई प्रमुख और चेन्नई सुपरकिंग्स के मालिक एन श्रीनिवासन के प्रति. धोनी को देश के लिए निजी संबंधों को तिलांजलि देनी होगी और अपने तरकश में वे अचूक तीर लाने होंगे, जो उन्हें एक बार फिर विश्‍वकप दिला सकें. अभी तक तो भारतीय चयनकर्ता भी ट्रायल एंड इरर मैथड एप्लाई करते दिख रहे हैं. उनके पास गेंदबाजों को लेकर कोई योजना नहीं है. जो खिलाड़ी विश्‍वकप बीसीसीआई और धोनी की योजनाओं में हैं, उन्हें समय रहते मा़ैका दिया जाना चाहिए, जिससे वे ज़्यादा से ज़्यादा मैच खेल सकें और खुद को क्रिकेट के महाकुंभ के लिए तैयार कर सकें. यदि बीसीसीआई ने समय रहते आवश्यक क़दम नहीं उठाए, तो रेत के महल को ढहने में बिल्कुल भी वक्त नहीं लगेगा.

खतरे में आईपीएल का भविष्य

आईपीएल का भविष्य खतरे में है? क्या चेन्नई सुपर किंग्स आईपीएल से बाहर की जा सकती है? कुछ ऐसे ही सवाल क्रिकेट प्रेमियों के जेहन में उच्चतम न्यायालय द्वारा आईपीएल में मैंच फिक्सिंग की जांच के लिए न्यायमूर्ति मुदगल की अध्यक्षता में गठित की गई कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद उठने लगे हैं. इस रिपोर्ट में पुष्टि की गई है कि बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मय्यप्पन चेन्नई सुपर किंग्स का हिस्सा हैं. इस बात को जांच के दौरान श्रीनिवासन और कप्तान धोनी नकार चुके हैं. आईपीएल के संविधान के मुताबिक यदि किसी भी टीम का मालिक फिक्सिंग के आरोपों में दोषी पाया जाता है तो आईपीएल से टीम को भी बर्खास्त किया जा सकता है. मुदगल कमेटी की जांच से इतर चेन्नई सीआईडी की जांच में कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और सुरेश रैना के शामिल होने की बात भी सामने आई है. इसके बाद क्रिकेट प्रमियों के लिए क्रिकेट का क्या अर्थ रह जाएगा? क्या क्रिकेट रूपी धर्म अपने पतन की ओर तेजी से अग्रसर है? संस्कृत में एक सूक्ति है, अति सर्वत्र वर्जयते. किसी भी चीज की अति ठीक नहीं होती है. बीसीसीआई को पैसे कमाने की ऐसी सूझी कि उसने क्रिकेट की विश्‍वसनीयता और खेल भावना दोनों को ताक पर रख दिया. आईपीएल-6 में सामने आए स्पॉट फिक्सिंग मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित मुद्गल कमेटी द्वारा रिपोर्ट पेश किए जाने के बाद भारतीय क्रिकेट में भूचाल आ गया है. एक बार फिर से क्रिकेट की नींव हिलने लगी है. बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन और चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और सुरेश रैना के ऊपर भी फिक्सिंग की परछाई पड़ रही है. रिपोर्ट में भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल एक खिलाड़ी सहित छह प्रमुख भारतीय खिलाड़ियों के फिक्सिंग प्रकरण में नाम सामने आने के कारण उनपर गाज गिर सकती है. उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त किए गए तीन सदस्यीय पैनल ने अपनी जांच में एन श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मय्यप्पन के सट्टेबाजी में शामिल होने की पुष्टि की है. कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार मय्यप्पन चेन्नई सुपर किंग्स के एक प्रमुख कार्यकारी सदस्य थे. उनपर सट्टेबाजी के लिए टीम से संबंधित सूचनाएं लीक करने के आरोप सही साबित हुए हैं. जांच में हुए खुलासे से एन श्रीनिवासन के मय्यप्न को महज खेल प्रेमी बताने वाले वक्वव्य का खंडन होता है. हालांकि उन पर लगे मैच फिक्सिंग के आरोपों की और अधिक गहराई से जांच करने की आवश्कता है. खासकर 12 मई, 2013 को जयपुर में राजस्थान रॉयल्स और चेन्नई सुपर किंग्स के बीच हुए मैच के संबंध में. इस मैच से संबंधित जो सूचनाएं और सुबूत अब तक उपलब्ध है, वे इस मैच को संदेह के दायरे में ले आती हैं. जस्टिस मुदगल ने यह भी कहा कि मैच फिक्सिंग मामले में मय्यप्पन की संलिप्तता है या नहीं इसके लिए सघन जांच की आवश्यकता है. जस्टिस मुदगल ने मैच फिक्सिंग मामले में राजस्थान रॉयल्स टीम के मालिक राज कुंद्रा की संलिप्तता की जांच किए जाने की भी आवश्यकता बताई है. मय्यप्पन विंदू दारा सिंह के मार्फत सट्टेबाज़ी में लिप्त थे, जो कि विक्रम अग्रवाल जैसे बुकी और सटोरियों से सीधे संपर्क में थे. मय्यप्पन ने सट्टेबाज़ी करते हुए सीएसके की जीत और हार दोनों में पैसे लगाए. इसे अंग्रेजी में हेज बेट्स कहते हैं, इसका मतलब दांव का बचाव होता है. ऐसा फायदे और संभावित नुक़सान को संतुलित करने के लिए किया जाता है. मैच फिक्सिंग के आरोप मय्यप्पन के खिलाफ सिद्ध हो जाते हैं तो सीएसके टीम को आईपीएल से बर्खास्त किया जा सकता है. आईपीएल के संविधान के मुताबिक यदि किसी टीम का मालिक मैच फिक्सिंग में लिप्त पाया जाता है तो टीम को आईपीएल से बर्खास्त किया जा सकता है. इस वजह से हर कोई मय्यप्पन को महज़ एक उत्साही क्रिकेट प्रशंसक बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहा था, लेकिन अब दूध का दूध और पानी का पानी हो गया है. आगे जांच में यदि मय्यप्पन को मैच फिक्सिंग का दोषी पाया जाता है तो गाज एन श्रीनिवासन पर भी गिरेगी. हाल ही में वे आईसीसी के प्रमुख बने हैं, उन्हें बीसीसीआई और आईसीसी दोनों संस्थाओं के प्रमुख का पद छोड़ना पड़ सकता है, जो कि उनके और भारतीय क्रिकेट के लिए एक बड़ा झटका होगा. गुरुनाथ मय्यप्पन की भूमिका कमेटी के सामने इंडिया सीमेंट्स के जो भी प्रतिनिधि जांच कमेटी के सामने प्रस्तुत हुए उन सभी ने दावे के साथ कहा कि मय्यप्पन की इंडिया सीमेंट्स में कोई हिस्सेदारी नहीं है. इस वजह से उन्हें चेन्नई सुपर किंग्स का मालिक नहीं माना जा सकता. बीसीसीआई अध्यक्ष और भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के अलावा इंडिया सीमेंट्स के अन्य अधिकारियों ने बयान दिया कि गुरुनाथ मय्यप्पन का सीएसके के क्रिकेट के मामलों से कोई लेना-देना नहीं था. वह एक खेल प्रेमी हैं, जो चेन्नई सुपर किंग्स के समर्थक हैं. जांच के दौरान यह बात प्रकाश में आई कि मय्यप्पन सीएसके के प्रैक्टिस सेशन, टीम मीटिंग में, खिलाड़ियों की नीलामी के दौरान, आईपीएल टीमों के मालिकों की वर्कशॉप में मालिक के रूप में प्रतिनिधित्व किया. दुनिया भर में उनकी पहचान टीम प्रिंसिपल या टीम के मालिक के रूप में है. जांच के दौरान खेल पत्रकार शारदा उग्रा ने बताया कि मय्यप्प्न टि्वटर पर खुद को सीएसके का टीम प्रिंसिपल बताते रहे हैं. लेकिन जब मय्यपन्न के ऊपर सट्टेबाजी में लिप्त रहने के आरोप लगे तो इस तरह के सारे सुबूतों को मिटाने की कोशिश की गई जिनसे यह जाहिर हो कि मय्यप्पन अब तक खुद को सीएसके का चीफ प्रिंसिपल बता रहे हों. मुंबई पुलिस ने जांच पैनल के सामने बिजनेस कार्ड्स और लेटर हेड प्रस्तुत किए, जिससे यह जाहिर होता है कि मय्यप्पन अब तक सीएसके के चीफ प्रिंसपल होने का दावा करते रहे हैं. आईपीएल के सीईओ सुंदर रमन ने जांच के दौरान बताया कि एक्रिडेशन कार्ड में मालिक लिखे होने और आईपीएल एग्रीमेंट के अंतर्गत मालिक होने में फर्क है. सीएसके टीम में अंततः मालिक कौन है, यह बात स्पष्ट नहीं है. आईपीएल गवर्निंग काउंसिल ने भी इस बात को स्पष्ट करने में ज्यादा रुचि नहीं दिखाई. जांच में यह पाया गया कि पिछले छह सालों में इंडिया सीमेंट्स ने मय्यप्पन के लिए एक्रिडेशन रिक्वेस्ट मालिक या मैनेजमेंट जैसे नामों से देने के लिए फारवर्ड की थी. 2011 में मय्य्पप्न को टीम डायरेक्टर के रुप में एक्रिडेशन दिया गया था, जिसमें उन्हें हर जगह आने-जान की अनुमति थी. साथ ही उनके लिए गोल्ड और मेनेजमेंट ब्लू पास की मांग की गई थी. इन सभी बातों से उनके सीएसके टीम का हिस्सा होने की बात साबित होती है. पैनल को इस बात का पूरा यकीन है कि मय्यप्पन को इस बात की जानकारी थी कि और वह ऐसी स्थिति में थे जहां उन्हें मैच की स्थिति, टीम की प्रमुख जानकारियां, टीम की रणनीति जैसी बहुत सी ऐसी जानकारियां उपलब्ध थीं, जो कि आम खेल प्रेमी के लिए उपलब्ध नहीं होती हैं. चेन्नई सुपर किंग्स के लिए खेलने वाले ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी माइक हसी ने अपनी किताब अन-अर्थ्ड द साउदर्न क्रॉस में चेन्नई सुपर किंग्स के बारे में लिखा है कि उनकी टीम का मालिकाना हक इंडिया सीमेंट्स के पास है, जिसके प्रमुख एन श्रीनिवासन हैं. उन्होंने टीम की बागडोर अपने दामाद गुरुनाथ मय्यप्पन को सौंपी है, जो कि कोच केपलर वेसल्स के साथ मिलकर टीम को संभाल रहे हैं. इसलिए मय्यप्पन पर आईपीएल के एंटी करप्शन कोड और दिशानिर्देश पूरी तरह लागू होते हैं. शक की सुई धोनी और रैना की ओर! एक फर्जी पासपोर्ट के मामले में जांच के दौरान चेन्नई सीबी-सीआईडी के एसपी रहे जी संपत कुमार के सामने एक सट्टेबाज़ किट्टी जैन ने खुलासा किया कि उसने एक छोटे से बुकी के रूप में शुरुआत की थी. पिछले कुछ सालों से वह होटल कारोबारी विक्रम अग्रवाल से जुड़ा हुआ है और उसका करीबी दोस्त बन गया है. किट्टी उर्फ उत्तम जैन ने बताया कि उसके पास विक्रम अग्रवाल, गुरुनाथ मय्यप्पन और क्रिकेट खिलाड़ी महेंद्र सिंह धोनी और सुरेश रैना के आलावा कुछ और राजस्थान रॉयल्स के खिलाड़ियों के मैच फिक्सिंग में शामिल होने की जानकारी दी. किट्टी अपने पीछे इंटेलिजेंस के पड़े होने की वजह से डरा हुआ था. इसके बाद विक्रम अग्रवाल ने किट्टी से अपना मुंह बंद रखने को कहा. उसने धमकी दी कि दाउद इब्राहिम के भाई अनीस इब्राहिम ने दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर बद्रीश दत्त और गीता शर्मा को दाउद इब्राहिम के भाई अनीस इब्राहिम के गैंग के लोगों ने मौत के घाट उतार दिया, क्योंकि उसे क्रिकेट में सट्टेबाज़ी के तार अंडरवर्ल्ड से जुड़े होने की पुख्ता जानकारी हो गई थी. इस संबंध में जब दिल्ली पुलिस से जानकारी हासिल की गई तो मालूम हुआ कि पुलिस इंस्पेक्टर ने गुड़गांव में अपनी पत्नी की हत्या करके आत्महत्या कर ली थी. किट्टी ने अपने छोटे भाई के कैंसर से पीड़ित होने की वजह से आत्मसमर्पण कर दिया था. किट्टी ने मैच फिक्सिंग के संबंध में बयान दिया कि विक्रम अग्रवाल और उसकी पत्नी वंदना गुरुनाथ मय्यप्पन और उनकी पत्नी रूपा के करीबी मित्र हैं. मय्यप्पन के जरिए विक्रम अग्रवाल की सीएसके के खिलाड़ियों से जान पहचान है. खासकर एम एस धोनी और सुरेश रैना से. विक्रम अग्रवाल और गुरुनाथ मय्यप्पन नियमित तौर पर सीएसके की कुछ विशेष मेहमानों के साथ डिनर पार्टी होटल रेडिशन ब्लू, एग्मोर या खिलाड़ियों के रुकने वाले होटल में आयोजित करते रहे हैं. किट्टी भी कई ऐसी पार्टियों में मय्यपन के साथ गया था. किट्टी और मय्यप्पन से राजस्थान के एक परिचित आदमी ने संपर्क किया. 21 और 23 अप्रैल को उन्होंने रेडिसन ब्लू होटल में उससे मुलाकात की. किट्टी के पास इस बातचीत की पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं थी. उसने इतना बताया कि विक्रम अग्रवाल ने उसे बताया था कि राजस्थान रॉयल्स और चेन्नई सुपर किंग्स के मैच फिक्सिंग को लेकर बातचीत चल रही है. बातचीत को अंतिम रूप देने के लिए मय्यप्पन सीएसके के कप्तान धोनी और कुछ अन्य खिलाड़ियों से बात करेगा. बाद में किट्टी को जानकारी मिली की सीएसके और राजस्थान रॉयल्स के बीच 12 मई, 2013 को होने वाले मैच को फिक्स करने की बात हो रही है. 27 अप्रैल को डिनर पार्टी के बाद भी इस विषय पर बातचीत चलती रही. विक्रम ने किट्टी को बताया कि कुछ डील पूरी हो गई हैं. डिनर पार्टी के बाद मय्यप्पन ने बताया कि चेन्नई सुपर किंग्स के एम एस धोनी ने प्लान के अनुसार खेलने पर सहमति जता दी है और उनकी टीम 140 रन बनाएगी और यह बात जयपुर के किसी संजय नाम के व्यक्ति को विक्रम अग्रवाल ने फोन पर दी, उस वक्त किट्टी भी विक्रम के पास था. इन लोगों के यूएई और सिंगापुर के देशों में भी संपर्क थे. जहां तक जानकारी है दोनों का एक कॉमन फ्रेंड यूएई में रहता है. भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान और सुरेश रैना का नाम इस प्रकरण में आना बहुत ही चौंकाने वाला है. धोनी ने अपनी कप्तानी के बल पर न केवल भारतीय क्रिकेट टीम को, बल्कि चेन्नई सुपर किंग्स को आईपीएल की सर्वश्रेष्ठ टीम बनाने में प्रमुख भूमिका निभाई है. चेन्नई सीबी-सीआईडी की जिस जांच रिपोर्ट में धोनी और रैना का नाम है, उस रिपोर्ट को दबाने की कोशिश की गई. वह रिपोर्ट मुदगल समिति के सामने भी नहीं पेश की गई, जबकि समिति ने विक्रम अग्रवाल को फिक्सिंग मामले की महत्वपूर्ण कड़ी माना है. सारी कड़ियां इंडिया सीमेंट्स के इर्द-गिर्द घूमती नज़र आ रही हैं. धोनी को पिछले साल ही इंडिया सीमेंट का वाइस प्रेसिडेंट नियुक्त किया गया है. उन्होंने मुदगल समिति को बयान देते समय इंडिया सीमेंट्स के हितों का बचाव किया. उन्होंने चैंपियंस ट्रॉफी के लिए रवाना होने से पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौन धारण कर लिया. चेन्नई पुलिस की जांच के सामने आने के बाद न्यूजीलैंड में दूसरे टेस्ट के पहले भी धोनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं पहुंचे. पिछले साल नई दिल्ली के विज्ञान भवन में सीबीआई द्वारा आयोजित कार्यक्रम में एथिक्स एन्ड इंटीग्रिटी इन स्पोर्ट्स विषय वक्तव्य देते हुए पूर्व भारतीय कप्तान राहुल द्रविड़ ने सट्टेबाज़ी को लीगलाइज करने की बात की थी. उनके अनुसार ऐसा करने से यदि खेलों में फैले भ्रष्टाचार में कमी आएगी तो मैं इसका समर्थन करता हूं. राहुल से पहले कई और लोग भी देश में सट्टेबाज़ी को कानूनी मान्यता देने की पैरवी कर चुके हैं. कुल मिलाकर इस बार भी क्रिकेट की साख को गहरा आघात पहुंचा है. आईपीएल-7 के लिए खिलाड़ियों की नीलामी के दौरान किसी के चेहरे और हावभाव में शिकन तक नजर नहीं आई. इस मसले पर हर कोई चुप्पी साधे हुए है. रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के विजय माल्या ने मुंह खोला तो उन्होंने भी सट्टेबाज़ी को लीगलाइज करने की बात कही. कुल मिलकर सट्टेबाजी को लीगलाइज करने के पक्ष में माहौल बनाया जा रहा है. ऐसा जताने की कोशिश की जा रही है कि इस तरह की गतिविधियों पर लगाम लगा पाना क्रिकेट अधिकारियों के हाथ में नहीं है, वो तो दूसरे के इशारों पर चलने वाली कठपुतली की तरह दिखाई दे रहे हैं. कुल मिलाकर जाल में फंसी बड़ी मछलियों को बचाने की हर संभव कोशिश हो रही है, जिसमें जांच के दौरान चेन्नई पुलिस की रिपोर्ट का जांच समिति तक न पहुंचना इसका एक उदाहरण है. शुक्र है कि जांच सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित पैनल करा रहा था, इसलिए बात यहां तक पहुंच सकी है. इस मामले में राजनीतिज्ञों की चुप्पी सबसे ज्यादा हैरान करने वाली है. कोई भी इसे विषय को मुद्दा नहीं बना रहा है. इससे तो यही सिद्ध होता है परदे की पीछे सबकुछ आपसी सहमति से चल रहा है. आम क्रिकेट प्रेमी समय और पैसा बर्बाद कर रहा है और बेवकूफ बन रहा है. इस पूरे खेल में केवल दर्शक ही है जो पूरी निष्ठा के साथ इससे जुड़ा हुआ है.

आईसीसी का केंद्रीकरण

एक ओर दुनिया भर में जहां सत्ता के विकेंद्रीकरण की हवा चल रही है. उसके ठीक उलट आईसीसी (अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद) सत्ता के केंद्रीकरण की ओर जा रही है. आईसीसी की कार्यकारिणी में व्यापक पैमाने पर बदलाव प्रस्तावित हैं, जिनके मूर्त रूप लेने पर वैश्‍विक क्रिकेट में प्रमुख निर्णय लेने का अधिकार भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसे धनी क्रिकेट बोर्डों के बीच केंद्रित हो जाएगा. इसके बाद अन्य देशों की विश्‍व क्रिकेट के संचालन में क्या भूमिका होगी, यह ब़डा सवाल है. क्या ये बदलाव क्रिकेट के हित में होंगे? आजकल आईसीसी में बदलाव की बयार चल रही है. आईसीसी के प्रशासनिक और वित्तीय ढांचे में व्यापक पैमाने पर बदलाव का प्रस्ताव रखा गया है. इसे लेकर दुनिया भर के देशों के बीच खींचतान चल रही है. इन बदलावों के मूर्त रूप लेने पर विश्‍व क्रिकेट में फैसले लेने के अधिकांश अधिकार वित्तीय रूप से सुदृढ़ भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के हाथों में आ जाएंगे और क्रिकेट जगत में इन तीन देशों का दखल बढ़ जाएगा. इसके बाद अधिकांश मामलों में इनकी भूमिका निर्णायक होगी. इस प्रस्ताव को लेकर टेस्ट खेलने वाले देश दो धड़ों में बट गए हैं. दोनों धड़ों के बीच बड़े पैमाने पर खींचतान हो रही है. पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) प्रस्तावित बदलावों का खुले तौर पर मुखालफत कर रहा है. दक्षिण अफ्रीका, बांग्लादेश और श्रीलंकाई बोर्ड पाकिस्तान के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं. कुछ बोर्ड अभी भी अनिर्णय की स्थिति में हैं. वहीं न्यूजीलैंड इन बदलावों को सकारात्मक और अपने हित में बता रहा है और इस प्रस्ताव का समर्थन कर रहा है. कोई क्रिकेट को बचाने की गुहार कर रहा है तो कोई व्यक्तिगत फायदे-नुकसान के आधार पर पोजीशन ले रहा है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिरकार आईसीसी में इस तरह के बदलाव करने की किसे और क्यों सूझी और वह इन बदलावों से क्या हासिल करना चाहता है? सबसे पहले आईसीसी में रद्दोबदल का यह प्रस्ताव आईसीसी का कॉमर्शियल राइट्स मीटिंग ग्रुप लेकर आया था. उसे लगा था कि इस तरह के बदलाव करने से आईसीसी की आय में कई गुना इज़ाफा होगा. इस प्रस्ताव को अमलीजामा पहनाने की कवायद आईसीसी ने शुरू कर दी है. फिलहाल बीसीसीआई अपने कद में इज़ाफा होने से खुश है. बीसीसीआई इस प्रस्ताव को अपनी जीत के रूप में देख रहा है. उसके अनुसार यह भारत की पैसे बना सकने की क्षमता को स्वीकृति मिलना (रिकग्नाइजेशन) है. बीसीसीआई आज दुनिया का सबसे धनवान क्रिकेट बोर्ड है. डीआरएस (डिसीजन रिव्यू सिस्टम) जैसे मुद्दों पर भारत के विरोध की वजह से आईसीसी इसे वैश्‍विक स्तर पर लागू नहीं कर सका, जबकि इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया हमेशा इसके समर्थन में रहे हैं. यदि प्रस्ताव के पारित होने के बाद इस तरह की कोई स्थिति निर्मित होती है, तब भारत क्या रुख अख्तियार करेगा. इस प्रस्ताव को पारित करवाकर भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे एशियाई सहयोगियों से दूर हो जाएगा. ये तीनों देश हमेशा बीसीसीआई के साथ खड़े दिखाई दिए. अब भारत सुपर थ्री में शामिल होने के बावजूद कई मुद्दों पर अकेला खड़ा दिखाई देगा, जहां उसके पास बचाव का कोई रास्ता भी नहीं होगा. इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) को क्रिकेट कैलेंडर में विंडो दिए जाने की पैरवी हमेशा से बीसीसीआई करता रहा है, ताकि दुनिया भर के क्रिकेटर उसमें खेल सकें और बीसीसीआई का खजाना भरता रहे, लेकिन निर्णायक भूमिका मिलने के बाद क्या भारत ऐसा कर पाएगा? उसके साथ वे देश निर्णायक भूमिका में होंगे, जो अपने खिलाड़ियों के आईपीएल में खेलने पर पांबदी लगाते रहे हैं. क्या सुपर थ्री में भारत अपने व्यावसायिक हित साध पाएगा? यह बात अभी साफ नहीं हो पा रही है. इस प्रस्ताव के विरोध में सबसे तीखी प्रतिक्रिया पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इमरान खान ने दी है. इमरान ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए बदलावों का विरोध किया है. उनके अनुसार ये बदलाव विवादास्पद हैं. यदि इन बदलावों को स्वीकृति मिल जाती है तो क्रिकेट एक बार फिर से औपनिवेशिक दौर में लौट जाएगा. इमरान का कहना है कि इस प्रस्ताव से उन दिनों की याद ताजा हो गई, जब इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के पास आईसीसी में वीटो पावर होती थी. उस दौर में भारत और पाकिस्तान की स्थिति कमोबेश एक जैसी ही थी. दोनों ही आईसीसी में साम्राज्यवाद को खत्म करने के लिए लड़ रहे थे और इसे लोकतांत्रिक तरीके से चलाने के पक्षधर थे, लेकिन आज भारत पैसे के प्रभाव तथा इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के समर्थन से इसे पुराने रूप में लाना चाहता है. यदि आज मैं पीसीबी का अध्यक्ष होता तो मैं इस औपनिवेशिक प्रणाली का खुलकर विरोध करता. पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष ज़का अशरफ ने आईसीसी मीटिंग के दौरान कहा कि यह देखना है कि हमें पैसा चाहिए या क्रिकेट. यदि क्रिकेट का वजूद बना रहेगा तो सभी बोर्डों को पैसा भी मिलता रहेगा, लेकिन यदि हम केवल पैसे के पीछे भागने लगेंगे तो यह क्रिकेट को वापस नहीं ला पाएगा. हो सकता है कि बांग्लादेश इस प्रस्ताव के समर्थन में खड़ा हो जाए, क्योंकि बांग्लादेश को व्यक्तिगत फायदे दिखाई दे रहे होंगे. उन्हें निकटवर्ती ही नहीं, दूरगामी परिणामों के बारे में भी सोच-विचार करना चाहिए. उन्हें इस बात का भी आकलन करना चाहिए कि इन बदलावों से हमारे देश और हमारे बोर्ड को क्या फायदा होगा. यह बहुत महत्वपूर्ण निर्णय है. इससे पाकिस्तान क्रिकेट का भविष्य भी प्रभावित होगा. इसलिए हम इसे हल्के में नहीं लेंगे और इन प्रस्तावों को लागू होने से रोकने की हरसंभव कोशिश करेंगे. न्यूजीलैंड क्रिकेट बोर्ड के आईसीसी में प्रतिनिधि मार्क स्नीडेन ने बीसीसीआई और प्रस्तावित बदलावों का बचाव करते हुए कहा है कि इन बदलावों से हमें फायदा होगा. ऐसा नहीं है कि वित्तीय फायदों के लिए भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड हमेशा आपस में क्रिकेट खेलते रहेंगे और बाकी टीमें आपस में खेलती रहेंगी. हमें अगले एक दशक में इन तीनों देशों के साथ बहुत क्रिकेट खेलनी है. पिछले कुछ सालों में आईसीसी के लिए सबसे बड़ी दिक्कत रही है कि भारत उनके खेमे में होने के बजाए बाहर रहता था. फिलहाल जो हो रहा है, वह इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया की भारत को अपने खेमे में शामिल करने की कोशिश है, ताकि आईसीसी में समय-समय पर खड़ी होने वाली अनिर्णय की स्थिति से निजात मिल सके. इन बदलावों से हमें आर्थिक फायदा भी मिलेगा. इन संशोधनों के बाद न्यूजीलैंड क्रिकेट का राजस्व 5.20 करोड़ डॉलर से बढ़कर लगभग सात से दस करोड़ डॉलर के बीच का हो जाएगा. श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड ने बदलावों की समीक्षा करने के लिए एक उपसमिति का गठन किया है. बोर्ड के अंदर इस संबंध में अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है. श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड के अधिकांश पदाधिकारी आईसीसी में होने वाले बदलाव के प्रस्ताव के खिलाफ हैं. लगभग सभी सदस्यों का मानना है कि इन बदलावों के लागू हो जाने से विश्व क्रिकेट पर भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड का दबदबा हो जाएगा. श्रीलंका क्रिकेट की कार्यकारी समिति ने इस संबंध में आपात बैठक के बाद कहा कि वह अपने मौजूदा अधिकारों और विशेषाधिकारों का बचाव करेगी. कई लोग इन बदलावों को धनी बोर्डों द्वारा पोषित कट्टरपंथी शासन व्यवस्था की स्थापना बता रहे हैं, क्योंकि बदलावों की वजह से पैसा और पॉवर दोनों ही भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड क्रिकेट बोर्डों के बीच केंद्रित हो जाएगा. दक्षिण अफ्रीकी बोर्ड ने इस प्रस्ताव को मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण बताते हुए इसका कड़ा विरोध कर रहा है और इसे वापस लेने की मांग कर रहा है. फेडेरेशन ऑफ इंटरनेशनल क्रिकेटर्स एसोसिएशन के कार्यकारी अध्यक्ष पॉल मार्श भी प्रस्तावित बदलावों को असंवैधानिक बताते हुए आलोचना कर रहे हैं. आईसीसी के प्रशासन और इसके राजस्व बंटवारे में आमूलचूल बदलाव की मांग का अगर पाकिस्तान, श्रीलंका, बांगलादेश और दक्षिण अफ्रीका विरोध करते हैं तो यह प्रस्ताव विफल हो जाएगा, क्योंकि इस प्रस्ताव को पारित कराने के लिए आईसीसी के 10 पूर्ण सदस्यों में से कम से कम सात सदस्यों का समर्थन मिलना जरूरी है. भारत, आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड को न्यूजीलैंड और जिम्बाब्वे का समर्थन मिलना तय लग रहा है, जबकि वेस्टइंडीज भी इस विवादास्पद प्रस्ताव के पक्ष में मतदान कर सकता है. इस प्रस्ताव को आईसीसी से पारित कराने के लिए दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश में से किसी एक देश को समर्थन में वोट देना होगा. नए बदलाव के बाद भारत को आठ गुना ज्यादा आमदनी आईसीसी से होगी. इससे बीसीसीआई की आमदनी 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच जाएगी. बदलाव से बीसीसीआई को तात्कालिक फायदा होता दिखाई दे रहा है, लेकिन लंबे समय में क्या कुछ होगा, इस बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल है. बीसीसीआई के लिए पैसे और पावर के लिहाज से ज्यादा ताकतवर हो जाएगा. फिलहाल बीसीसीआई केवल अधिकारों की बात कर रहा है. उसके अनुसार इन बदलावों की वजह से वैश्‍विक क्रिकेट गतिविधियों में कोई बदलाव नहीं आएगा. न ही अन्य देशों की भूमिका खत्म हो जाएगी. अन्य देशों को भी एग्जीक्यूटिव कमेटी में शामिल किए जाने के भी कई तरह के प्रस्तावों पर चर्चा हो रही है, जिससे कि निर्णय लेने में अन्य देशों की भूमिका बनी रह सके. आईसीसी में इस तरह के बड़े बदलाव से क्रिकेट को फायदा होगा या नुकसान या फिर क्रिकेट एक वैश्‍विक खेल में परिवर्तित हो पाएगा, इन सलावों का कोई स्पष्ट जवाब कहीं भी दिखाई नहीं पड़ रहा है. यहां सबसे बड़ी चुनौती टेस्ट क्रिकेट के वजूद को बचाए रखने और टी-20 के माध्यम से क्रिकेट को वैश्‍विक खेल में परिवर्तित करने की है. इन दोनों चुनौतियों का एक साथ सामना करना और उनके बीच तालमेल बना पाना मुश्किल जरूर है, लेकिन नामुमकिन नहीं. बदलाव का लक्ष्य केवल धन उगाही नहीं होना चाहिए. खेल की गुणवत्ता को बनाए रखना सबसे ज्यादा जरूरी है. क्रिकेट को केवल रन और पैसे के खेल या कहें कि बेसबॉल जैसे खेल में बदलने से रोकना होगा. क्रिकेट में रोमांच ऑन फील्ड गतिविधियों की वजह से आना चाहिए, न कि ऑफ फील्ड एक्टीविटी से. फिलहाल जो बदलाव हो रहे हैं, उनसे ऑफ फील्ड गतिविधियां क्रिकेट पर हावी होती दिख रही हैं. यदि आगे ऐसा होगा तो क्रिकेट का भविष्य सुरक्षित नहीं रह जाएगा.

क्रिकेट की पिच पर बोल्ड बालाएं

बॉबॉलीवुड हसीनाओं को तो सभी प्यार करते हैं, लेकिन इन हसिनाओं का जादू क्रिकेटर्स के सिर कुछ ज्यादा ही च़ढ कर बोलता है. इन दिनों एक और बॉलीवुड हसीना रब ने बना दी जोड़ी फेम अनुष्का शर्मा और क्रिकेटर विराट कोहली सुर्खियों में हैं. अभी हाल ही में ऑकलैंड में भारत और न्यूजीलैंड के बीच टेस्ट मैच चल रहा था. टेस्ट मैच में विराट कोहली भी टीम में थे. विराट की दीवानी अनुष्का व्यस्त शेड्यूल के बावजूद पहुंच गईं उनसे मिलने. तभी उनके किसी फैन ने उनकी फोटो क्लिक कर ट्वीटर पर पोस्ट कर दिया. दोनों की नजदीकियों का कयास मीडिया में लंबे समय से लगाया जा रहा है, लेकिन अनुष्का कहती हैं कि विराट और वह स़िर्फ अच्छे दोस्त हैं. वह कहती हैं कि दरअसल वह विराट से एक शैंपू के शूट के दौरान मिली थीं. पहले तो उन्हें लगा कि विराट बहुत घमंडी हैं, इसलिए वह भी उनसे इसी अंदाज़ में पेश आ रही थीं, लेकिन जब अनुष्का ने विराट के साथ शूटिंग की, तब उन्हें लगा कि विराट बहुत कूल हैं. दोनों ने तीन दिनों तक साथ में शूटिंग की, इस दौरान उनकी दोस्ती हो गई. शूटिंग के बाद उन्होंने अपने घर में एक पार्टी दी थी, जिसमें उन्होंने विराट को भी बुला लिया, तभी से दोनों के अफेयर की बातें की जा रही हैं. हालांकि दोनों के रिश्ते की सच्चाई तो वही जानें, पर हम आपको बता रहे हैं कुछ ऐसी ही अभिनेत्रियों और क्रिकेटर्स की कुछ सफ़ल और कुछ असफ़ल प्रेम कहानियों के बारे में… शर्मिला टैगोर-नवाब पटौदी: कश्मीर की कली शर्मिला टैगोर और नवाब पटौदी दोनों ही अलग अलग बैकग्राउंड से थे. शर्मिला टैगोर एक मीडिल क्लास फैमिली से थीं, वहीं मंसूर अली ख़ान नवाब थे. पर यह फर्क उनके प्यार में कहीं रोड़ा नहीं बना. शर्मिला उस समय की हॉट एक्ट्रेसेज में गिनी जाती थीं तो नवाब पटौदी भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान थे. दोनों सिलेब्रिटी थे. दोनों दिल्ली में एक कॉमन फ्रेंड के ज़रिए मिले. चार साल के अफेयर के बाद उन्होंने शादी करने की सोची. हालांकि दोनों के परिवारों को अलग-अलग बैकग्राउंड के कारण इस शादी को लेकर कुछ संशय था. तब लोगों को लग रहा था कि यह शादी अधिक दिन तक नहीं चल पाएगी. पर दोनों 42 साल नवाब पटौदी की मौत तक साथ रहे. रवि शास्त्री-अमृता सिंह : लोकप्रिय खिलाड़ी रवि शास्त्री और अभिनेत्री अमृता सिंह के प्यार के किस्से 80 के दशक में आम थी. दोनों अपने-अपने क्षेत्रों में कामयाब थे. शारजाह के मैदान पर शास्त्री के हर चौकों पर अमृता का खुश होना उनके प्यार की कहानी बयां कर गया. हालांकि दोनों ने पब्लिकली कभी अपने प्यार की बात कुबूल नहीं की. रवि शास्त्री की पर्सनैलिटी का जादू कुछ ऐसा था कि लड़कियां उन पर फ़िदा हो जाती थीं, लेकिन उनका दिल आया अमृता पर और दोनों ने सगाई भी कर ली, लेकिन बाद में दोनों अलग हो गए. रवि शास्त्री ने रितु सिंह से शादी कर ली और कुछ साल बाद अमृता ने भी सैफ़ अली ख़ान के साथ घर बसा लिया. पर शादी के काफ़ी साल बाद अमृता और छोटे नवाब की शादी टूट गई तो ख़बरें आईं कि रवि की भी अपनी पत्नी से नहीं बन रही है और दोनों तलाक लेना चाहते हैं. कपिल देव-सारिका: ऑल राउंडर कपिल देव का पहला प्यार रोमी भाटिया हैं. रोमी से उन्होंने शादी की. दोनों की एक बेटी है अमिया देव. पर उनके जीवन का एक पहलू ऐसा भी है, जिसे कम ही लोग जानते हैं. जी हां एक वक्त ऐसा था, जब कपिल देव अभिनेत्री सारिका के दीवाने थे. दोनों ने कुछ ख़ूबसूरत पल साथ बिताया और अलग हो गए. कपिल रोमी से एक कॉमन फ्रेंड के ज़रिए मिले थे. कुछ समय बाद दोनों ने शादी कर ली. शादी के कुछ समय बाद दोनों में अनबन हो गई और रोमी कपिल को छोड़ कर चली गईं. तभी उनकी ज़िंदगी में सारिका की ऐंट्री हुई. सारिका कपिल के परिवार वालों के साथ भी घुल-मिल गईं, पर जब तक दोनों अपने रिश्ते को लेकर किसी निर्णायक मोड़ पर पहुंचते, रोमी वापस कपिल की ज़िंदगी में आ गईं. अंजू महेंद्रू-गैरी सोबर्स: वर्षों पहले इंडिया-वेस्ट इंडीज मैच के दौरान अभिनेत्री और मॉडल अंजू महेंद्रू की ख़ूबसूरती के दीवाने वेस्ट इंडीज के कप्तान गैरी सोबर्स हो गए थे. कुछ दिनों बाद दोनों ने सगाई भी कर ली, लेकिन फिर बाद में अंजू अलग हो गईं. बकौल अंजू वे और गैरी दोनों एक कॉमन फ्रेंड के घर मिले थे. गैरी अंजू के डांस पर फिदा हो गए. गैरी ने उनके डांस की तारीफ़ की. उनकी नजदीकियां ब़ढती गईं. हालांकि अंजू ने कहा कि तब उनके लिए यह बड़ी बात थी कि उस समय गैरी ने उन्हें और उनकी फैमिली को मैच के लिए इन्वाइट किया. गैरी ने उन्हें प्रपोज किया और रिंग पहनाई, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया. बाद में उन्हें एहसास हुआ कि वह गैरी के व्यक्तित्व से आकर्षित थी और उन्हें यह बात रोमांचित करती थी कि इतना बड़ा स्टार उन्हें प्यार करता है, लेकिन उन्होंने जब गंभीरता से इस बारे में सोचा तो लगा कि वह गैरी से प्यार नहीं करतीं. यह महज आकर्षण है. काफ़ी सोचने के बाद उन्होंने रिंग लौटाने का फैसला कर लिया. उन्होंने स्वीकार किया कि तब दरअसल उनका राजेश खन्ना से अफेयर चल रहा था, दोनों की लड़ाई हो गई थी तो उन्होंने मजे लेने के लिए भी गैरी से नजदीकियां ब़ढाई थी. अंजू महेंद्रू-गैरी सोबर्स : एक समय में शत्रुघ्न सिन्हा और रीना रॉय के प्यार के चर्चे बॉलीवुड में आम थे, पर शत्रुघ्न सिन्हा ने अचानक पूनम से शादी करके सबके साथ रीना को भी चौका दिया. जब पूनम से उन्होंने शादी की, तब रीना इंडिया में नहीं थीं. रीना के लिए यह बेहद शॉकिंग था, उन्होंने कहा भी कि शत्रु को उनकी अनुपस्थिति में शादी करने की क्या जरूरत थी. इसके बाद शत्रु और रीना ने एक-दूसरे को पलटकर भी नहीं देखा. पर वह ज़्यादा दिन अकेली नहीं रहीं. उनके जीवन में पाकिस्तान के स्टार क्रिकेटर मोहसिन ख़ान आ गए. दोनों ने अपने प्यार को पाने के लिए हर दीवार तोड़ दी. रीना रॉय मोहसिन के प्यार में बंधी फिल्में छोड़ पाकिस्तान जा बसीं. बाद में बॉलीवुड की याद रीना को भारत खींच लाई. उनके साथ मोहसिन भी भारत आ गए. मोहसिन ने गुनहगार कौन, प्रतिकार, फतेह जैसी कुछ फिल्मों में काम भी किया, लेकिन न फिल्में चलीं और न उनका साथ. बेटी सनम के जन्म के बाद दोनों अलग हो गए. विवियन रिचर्ड्स-नीता गुप्ता: आर्ट फिल्मों की बेहतरीन अभिनेत्री नीना गुप्ता क्रिकेटर विवियन रिचर्ड्स के प्रति कुछ इस तरह आकर्षित हुईं कि उनके लिए सबकुछ कर गुजरने को तैयार हो गईं. दोनों कुछ समय साथ रहे. बाद में दोनों अलग हो गए, क्योंकि विव की पहली प्राथमिकता उनका क्रिकेट था. पर कुछ दिनों के प्यार में ही विव की निशानी नीना के गर्भ में आ गई. तमाम मुश्किलों के बावजूद नीना ने बच्ची को जन्म दिया. उनकी बेटी मसाबा ने कम उम्र में ही कई उपलब्धियां दर्ज कराई. मोहम्मद अजहरुद्दीन-संगीता बिजलानी: वर्ष 1980 में मिस इंडिया चुनी गई थीं संगीता बिजलानी. संगीता की ख़ूबसूरती के कायल सलमान भी थे. दोनों की शादी के कार्ड भी छप गए थे. पर दोनों अलग हो गए. फिर संगीता अजहर के प्यार में पड़ीं. कहते हैं कि संगीता की दीवानगी में अजहर 1996 का वर्ल्ड कप भी हार गए थे. यही नहीं दो बच्चों और पत्नी नौरीन को भी उन्होंने संगीता के ख़ातिर छोड़ दिया. अब उनके रास्ते में कोई रुकावट नहीं थी. दोनों ने आख़िर शादी कर ली. संगीता एक अच्छी पत्नी साबित हुईं. उन्होंने हर बुरे वक्त में अजहर का साथ दिया. शादी के काफ़ी समय बाद दोनों में अलगाव की ख़बरें आने लगीं. अजहर की ज्वाला गुट्टा से नजदीकियों की ख़बरें भी आईं. सौरभ गांगुली-डोना गांगुली: सौरभ और डोना को आइडियल कपल के रूप में देखा जाता है, पर बॉलीवुड हसीना की ख़ूबसूरती के जादू से सौरभ भी नहीं बच पाए थे. कभी नगमा और उनके प्यार की ख़बरें सुर्खियों में होती थीं. नगमा से उनकी मुलाकात 1999 वर्ल्ड कप के दौरान लंदन में हुई थी. ऑस्ट्रेलियाई मीडिया में दोनों के प्यार की ख़बर को ख़ूब परोसा गया. वहां की मीडिया ने लिखा कि सौरव फिलहाल रनिंग बिटवीन द विकेट में बिजी हैं और इस विकेट के एक एंड पर उनकी पत्नी डोना तो दूसरे एंड पर बॉलीवुड एक्ट्रेस नगमा हैं. चेन्नई के कुछ अख़बारों में ख़बर छपी थी कि सौरव और नगमा चेन्नई से क़रीब 40 किलोमीटर दूर एक मंदिर में कालसर्प निवारण दोष की पूजा के लिए साथ-साथ गए थे. बाद में ख़बर आई कि सौरभ और नगमा के बिच सब ख़त्म हो गया है. नगमा ने कहा कि यह सच है कि सौरव के साथ उनका अफेयर था, लेकिन अब यह बीती बात है. उन्होंने कहा कि हमारा रिश्ता आपसी समझ पर आधारित था, लेकिन परिस्थितियां कुछ ऐसी थीं कि सौरव को मुझसे ज़्यादा किसी और को प्राथमिकता देनी पड़ी. युवराज-किम शर्मा: युवराज का नाम किसी एक हसीना के साथ नहीं, बल्कि कइयों के साथ जुड़ा. युवराज का नाम सबसे पहले बॉलीवुड एक्ट्रेस किम शर्मा के साथ जुड़ा. दोनों का अफेयर 4 साल तक चला. तब माना जा रहा था कि दोनों शादी भी करने वाले हैं. पर युवी और भी हसीनाओं के जुल्फों में खो जाते थे. किम के बाद युवराज की ज़िंदगी में दीपिका पादुकोण आईं. कुछ वक्त तक इस जोड़ी का रोमांस परवान भी च़ढा. ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान दीपिका युवराज का जन्मदिन मनाने ऑस्ट्रेलिया तक पहुंच गई थीं, पर इनकी कहानी आगे ब़ढती. इससे पहले ही दीपिका और धोनी एक-दूसरे के प्यार में पड़ गए. युवी का नाम अभिनेत्री प्रीति झिगयानी, मीनिषा लांबा और अमिषा पटेल के साथ भी जुड़ा. महेंद्र सिंह-लक्ष्मी और दीपिका-धोनी का दिल उनकी स्टाइलिश गर्लफेंड और अब बीवी साक्षी के अलावा कई बॉलीवुड बेब्स के लिए भी क्लीन बोल्ड हुआ. उनका नाम साउथ की एक्ट्रेस लक्ष्मी राय के साथ जुड़ा था, लेकिन फिर उनकी नजदीकियां दीपिका पादुकोण से ब़ढ गई थीं. पर उन्होंने इन सबको दरकिनार कर साक्षी से शादी कर ली. जहीर ख़ान-इशा शरवानी: किसना फेम इशा शरवानी के प्रेम में खोए जहीर उनके साथ पिछले तीन साल से हैं. दोनों के एक-दूजे के बनने में बाधक हैं उन्हीं के माता-पिता. एक तो दोनों अलग अलग धर्म से हैं और इशा के माता पिता को उनकी बेटी का एक क्रिकेटर से प्यार पसंद नहीं आ रहा है. वहीं ज़हीर के घरवालों को भी कुछ ऐसी ही परेशानी है. वे एक अभिनेत्री को बहू नहीं बनाना चाहते. पर फिर भी दोनों अपने घरवालों को मनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. हरभजन सिंह-गीता बसरा: हरभजन सिंह के दिल की धड़कन हैं अभिनेत्री गीता बसरा. दोनों के बीच प्यार और फिर ब्रेकअप की ख़बरें भी आईं. हालांकि कई मा़ैकों पर दोनों साथ होते हैं. हरभजन सिंह की बहन की शादी पर गीता भी उपस्थित थीं. इसके अलावा, जब हरभजन सिंह की पार्टी पुलिस ने रुकवाई थी. तब गीता बसरा भी उनके साथ थीं. इसके अलावा, वह उस जगह भी उपस्थित होती हैं, जहां हरभजन खेल रहे होते हैं. उनके करीबियों का कहना है कि दोनों को शादी की कोई जल्दी नहीं है, पर दोनों एक-दूजे के होना चाहते हैं. एंड्रयू सायमंड्स-मिनिषा लांबा: एंड्रयू सायमंडस और हरभजन सिंह के बीच हुए मंकी गेट विवाद के बाद सायमंड्स को भारतीय क्रिकेटरों का विरोधी माना जाने लगा था, लेकिन उन्हें अब भारत की सुंदरी से प्यार हो गया है. इसलिए भारत अब उन्हें अच्छा लगने लगा है. बॉलीवुड ब्यूटी मिनिषा लांबा और ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर एंड्रयू सायमंड्स कई जगहों पर साथ-साथ नज़र आते हैं. सायमंड्स मिनिषा के लिए इतने ख़ास हैं कि उन्होंने अपना जन्मदिन भी सायमंड्स साथ एक होटल में मनाया. उनके क़रीबियों का कहना है कि दोनों एक-दूसरे के साथ काफ़ी खुश हैं.

श्रीनाथ और रवि होंगे विश्व कप में मैच अधिकारी

दुबई। जवागल श्रीनाथ और एस. रवि आईसीसी ट्वेंटी-20 विश्व कप में बतौर मैच अधिकारी अपनी सेवाएं देंगे। बांग्लादेश में 16 मार्च से 6 अप्रैल तक होने वाले विश्व कप के लिए आईसीसी ने भारत से दो ही लोगों को नियुक्त किया है। आईसीसी ने सोमवार को मैच अधिकारियों की सूची जारी की। आईसीसी के मैच रैफरी के एलीट पैनल में शामिल श्रीनाथ के साथ डेविड बून, रंजन मदुगले, रोशन महानामा भी इस सूची में हैं। आईसीसी ए एलीट पैनल में शामिल सभी 11 अंपायरों को मैदानी अंपायर का दायित्व सौंपा गया है। इनमें अलीम दार, कुमार धर्मसेना, स्टीव डेविस, इयान गोल्ड, बिली बोडेन और रवि के नाम शामिल हैं।

तीसरी बार स्विस ओपन ग्रांपि गोल्‍ड खिताब जीतना चाहेंगी साइना

बासेल। ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप के क्वार्टर फाइनल से बाहर होने के बाद भारत की शीर्ष खिलाड़ी साइना नेहवाल मंगलवार से शुरू होने वाले स्विस ओपन ग्रांप्रि गोल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप का खिताब फिर से हासिल करने का प्रयास करेंगी। दो बार की चैंपियन साइना यहां 2011 व 2012 के खिताब जीत चुकी है और पिछले वर्ष यहां सेमीफाइनल तक पहुंची थी। उन्हें इस वर्ष छठी वरीयता दी गई है। ओलिंपिक कांस्य पदक विजेता साइना अपने अभियान की शुरुआत क्वालीफायर के खिलाफ करेंगी और उनका क्वार्टर फाइनल तक का सफर आसान लग रहा है। हालांकि क्वार्टर फाइनल में उनका संभवित सामना शीर्ष वरीयता प्राप्त चीन की यिहान वांग से हो सकता है। यिहान का साइना के खिलाफ जीत-हार का रिकॉर्ड 6-1 है। पिछला मुकाबला साइना ने पूर्व विश्व चैंपियन के रिटायर होने से जीता था। साइना की साथी खिलाड़ी पीवी सिंधू को सातवीं वरीयता मिली है। विश्व चैंपियनशिप की कांस्य पदक विजेता सिंधू को ड्रॉ के दूसरे हाफ में रखा गया है। वे पहले ही दूसरे दौर में स्थान बना चुकी है। उनके पहले दौर की विपक्षी खिलाड़ी स्पेन की बीट्रिज कोरालेस इस टूर्नामेंट से हट गईं हैं। विश्व की नौंवे क्रम की सिंधू का क्वार्टर फाइनल में संभावित मुकाबला फॉर्म में चल रही चीन की शिजियान वांग से हो सकता है। वांग ने विश्व की नंबर एक खिलाड़ी ली झुरूई को हराकर ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप का खिताब जीता था। हालांकि सिंधू उन्होंने पहले हुए दो मुकाबलों में हरा चुकी हैं। महिला एकल वर्ग में एक अन्य भारतीय साइली राणे को पहले ही दौर में तीसरी वरीयता प्राप्त शिजियान से खेलना है। पुरुष वर्ग में पारूपल्ली कश्यप के लिए अपनी खोई लय हासिल करने का अच्छा मौका है। भारतीय खिलाड़ी को तीसरी वरीयता दी गई है और उनका क्वार्टर फाइनल तक का रास्ता आसान है। यहां उनका सामना शीर्ष वरीयता प्राप्त और विश्व के चौथे क्रम के जान ओ जोर्गेनसन से हो सकता है। भारत के युवा किदम्बी श्रीकांत को पांचवीं वरीयता दी गई है और वे अपना अभियान विश्व के 42वें क्रम के हेनरी हुर्सकीनेन के खिलाफ शुरू करेंगे। उनके अलावा आनंद पवार भी टूर्नामेंट में हिस्सा ले रहे हैं। महिला युगल वर्ग में ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा को सीधे मुख्य ड्रॉ में प्रवेश मिला है और अश्विनी मिश्रित युगल वर्ग में तरूण कोना के साथ हिस्सा लेंगी।